Tuesday, October 22, 2019

ग़ज़ल ( डूबती मौजों में कश्ती जैसे साहिल पर मिले )

डूबती मौजों में कश्ती जैसे साहिल पर मिले 
सिलसिला हर बार दिल का दर्द से जाकर मिले

टूट कर आगोश में वो हमसे यूं आकर मिले 
खोल कर बाहें नदी को जिस तरह सागर मिले

ऐ ज़माने हक़ बयानी कब तुम्हें मंज़ूर थी 
हर मसीहा को तुम्हारे हाथ में पत्थर मिले

इस जहां में क्या शबाहत हो मेरे महबूब की
चांद तारे, फूल सब उस हुस्न से कमतर मिले

और चमकेगी यकीनन, दौर-ए-हाज़िर में ग़ज़ल
इल्म के सब तालिबों को गर कोई रहबर मिले

इश्क़ में काफ़िर को हासिल हो फना कुछ इस तरह
जिस तरह कुकनुस को जलकर इक नया पैकर मिले

जगजीत काफ़िर

शबाहत = एकरुपता, हमशक्ली
कुकनुस = एक पौराणिक पक्षी जो अपनी राख से पुनर्जीवित हो जाता है

Monday, October 7, 2019

Jagjitkaafir


ग़ज़ल ( ज़िन्दगी के नाम पर )

चंद सांसें ही मिली हैं, ज़िन्दगी के नाम पर
वो भी ज़ाया हो रही हैं, आशिक़ी के नाम पर

उसने जाना ही था मुझको, यूं अकेला छोड़ कर
कर गया तर्क-ए-तअल्लुक, बेबसी के नाम पर

इस मुहब्बत के लिए, मशकूर हूं मैं आप का
ये ग़ज़ल मैं कह रहा हूं, आप ही के नाम पर

इश्क है किसको ख़ुदा से, बस दिलों का ख़ौफ है
नाम की ही बंदगी है, बंदगी के नाम पर

रहनुमा के भेस में, ताजिर भरे हैं इल्म के
जो अंधेरे बेचते हैं, रौशनी के नाम पर

वो नज़ाकत, वो नफ़ासत, अब कहां बाकी रही
बहर ही तो निभ रही है, शायरी के नाम पर

उसने सीखे ही नहीं थे, तौर दुनिया के अभी
लुट गया काफ़िर जहां में, सादगी के नाम पर

जगजीत काफ़िर

तर्क-ए-तअल्लुक = रिश्ता तोड़ना
मशकूर = शुक्रगुज़ार
ताजिर = व्यापारी

چند سانسیں ہی ملی ہیں۔زندگی کے نام پر۔
وہ  بھی  زایہ  ھورہی  ہیں عاشقی کے نام پر۔

اس نے جانا ہی تھا ۔یوں اکیلے مجھے چھوڑ کر
کر گیا ترک تعلق  بے  بسی کے نام پر۔

اس محبت کیلئے  مشکور   ھوں میں آپ کا۔
یہ  غزل    میں   کہ  رھا ھوں ، آپ ہی کے نام پر۔

عشق  ھے   کس  کو  خدا سے ، بس دلوں کا خوف ھے۔
نام  کی  ہی  بندگی  ھے ۔بندگی  کے نام پر۔

راہنما   کے    بھیس   میں
تاجر بھرے  ہیں علم کے۔
جو اندھیرے بیچتے ہیں۔روشنیوں کے نام پر۔

وہ   نزاکت ، وہ   نفاست ، اب  کہاں  باقی  رہی۔
بحر  ہی  نبھ  رہی  ہے۔شاعری کے نام پر۔

اس  نے  سیکھے ہی  نہیں تھے ، تور  دنیا کے ابھی۔
لٹ  گیا  کافر  جہاں  میں،
سادگی  کے نام پر۔

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