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Friday, February 19, 2016

मैं रहता हूं

मैं ढूंढता रहता हूं, उन लम्हों को हमदम,
जिन लम्हों में मैं, मैं रहता हूं.
ये दिन गुज़रता है नकाब़ों के साये,
बस रात को ही मैं, मैं रहता हूं.
हर लम्हा ढूंढ रहा हूं खुशियों की बस्ती,
क्या जाने किस तलाश में, मैं रहता हूं.
मुझको नहीं यकीन इस बेबस निज़ाम पे,
इक तलाश-ए-वजूद में, मैं रहता हूं.
जाने वो कर सकूं, दिल में दबी है जो,
ख्वाहिशों के पेच-ओ-ताब में, मैं रहता हूं.
मेरे खुदा मुझे चाहे तो मौत दे दे,
काफिर हूं इस खुदी में भी, मैं रहता हूं.

Wednesday, March 16, 2011

याद


हर आहट पे दौड उठते थे दरवाजे की ओर हम,
उनका या उनके खत का हमें इन्तज़ार था.
हमारी तमाम उम्र गयी इन आंखो के रास्ते,
जाने कब नसीब-ए-चश्म मे उनका दीदार था.
हासिल कहां था कदमो को उनकी गली का मोड़,
सुनाते भी किस तरह जो हाल-ए-करार था.
पहरे थे हमारी हस्ती पर निगाह-ए-जहान के,
आना हमारा उन को भी कुछ ना-गवार था.
हमको वहम था कुर्बत का उन की अदाओं से,
ये तबस्सुम तो उनकी आदत में कब से शुमार था.
दिल मे यही थी आरज़ू के मिलते कभी उन्हे,
तफ़्सील से निकलता जो दिल में गुबा़र था.
करते दुआ भी कैसे हम उनके विसाल की,
हम को खुदा पे पहले ही कब ऐतबार था.
तर्क-ए-अज़ार-ए-इश्क की नसीहत किये सभी,
क्या कहिये के इसमे काफ़िर ये बे-इख्तयार था.
चश्म = नज़र
कुर्बत = नज्दीकी
तबस्सुम = मुस्कान
तफ़्सील = विस्तार
विसाल = मिलन
अज़ार= रोग
तर्क = छोडना