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Thursday, February 17, 2011

हकीकत


अपने मुकद्दर की फ़ितरत से वाकिफ़ हूं मैं,
अपनी गुऱबत का भी मुझ को  अहसास है.
महज़ चन्द कतरे हैं हासिल मेरे लबों को,
और समन्दर की दिल मे दबी प्यास है.
सोचने का सबब हैं , ये कुर्बतें भी,
चन्द ही रोज़ की तो रफ़ाकत है तुमसे.
अपने लगते हो जब के हो गैर भी,
किस बिना पर कहूं के मोहब्बत है तुमसे.
मै हिरासां हूं ना टूट जाएं कहीं,
इन दिनो खाब जो तुम दिखाती हो मुझको.
तेरी आदत ही ना हो ये तेरा तब्बसुम,
बे-वजह तुम खिलोना बनाती हो मुझको.
पेश्कदमी से पहले ज़रा सोच लो तुम,
क्या अपने अहद को निभा भी सकोगी?
मेरे हमराज़ हैं मेरे माज़ी के साये,
इन अन्धेरों से खुद को बचा भी सकोगी ?