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Tuesday, May 18, 2021

ग़ज़ल ( याद आएगा )

उसका ज़िक्र हुआ तो अक्सर याद आएगा
हमको लाशों का सौदागर याद आएगा
اس کا ذکر ہوا تو اکثر یاد آئے گا،
ہم کو لاشوں کا سوداگر یاد آئے گا،

कफ़न बहुत थे पर मिट्टी या आग नहीं थी
हमको ये सारा ही मंज़र याद आएगा
کفن بہت تھے پر مٹی یہ آگ نہیں تھی،
ہم کو یہ سارا ہی منظر یاد آئے گا،

उसको अपना दर्द बताना बेमानी है
उसको हर विपदा में अवसर याद आएगा
اس کو اپنا درد بتانا بے معنی ہے،
اس کو ہر وپدا میں اوسر یاد آئے گا،

मजदूरों के पांव तुम्हें जब याद आएंगे
हर इक छाला, एक एक कंकर याद आएगा
مزدوروں کے پاؤں تمہیں جب یاد آئیں گے،
ہر ایک چھالا ایک ایک کنکر یاد آئے گا ،

देखेंगे जब एक तराजू वाली देवी
उसकी पीठ में किसका खंजर याद आएगा ?
دیکھیں گے جب ایک ترازو والی دیوی،
اس کی پیٹھ میں کس کا خنجر یاد آئے گا،

जिस दिन सारा मुल्क ही बिक जाएगा, उस दिन
शाहों का इक शाही नौकर याद आएगा
جس دن سارا ملک ہی بک جائے گا اس دن،
شاہوں کو ایک شاہی نوکر یاد آئے گا،

कौन भला अब याद करेगा उस ज़ालिम को
कौन दुआएँ देगा वो गर याद आएगा
کون بھلا یاد کرے گا اس ظالم کو،
کون دعائیں دے گا وہ گر یاد آئے گا،

ख़ून सनी रोटी को खाते हैं जो काफ़िर
उनको भी तो इक दिन महशर याद आएगा
خون سنی روٹی کو کھاتے ہیں جو کافر،
ان کو بھی تو اک دن محشر یاد آئے گا۔

जगजीत काफ़िर جگجیت کافر

Wednesday, April 7, 2021

ग़ज़ल ( ज़मीनों में )

नहीं मिलना है कुछ इन फ़िक्र की बंजर ज़मीनों में
चलो अहसास को ढूंढें ज़रा दिल के दफ़ीनों में
نہیں ملنا ہے کچھ ان فکر کی بنجر زمینوں میں
چلو احساس کو ڈھونڈھیں ذرا دل کے دفینوں میں

तड़पना भूल बैठी हैं सनमख़ाने की दीवारें
नहीं अब संग-ए-दर को फोड़ने का दम जबीनों में
تڑپنا بھول بیٹھی ہیں سنمخانے کی دیواریں
نہیں اب سنگ در کو پھوڑنے کا دم جبینوں میں

हमारी खाल तक झुलसी हुई है इनकी सोहबत से
छुपा रक्खे हैं इतने सांप हमने आस्तीनों में
ہماری کھال تک جھلسی ہوئی ہے انکی صحبت سے
چھپا رکھے ہیں اتنے سانپ ہم نے آستینوں میں

ये कब्रिस्तान सारे यादगार-ए-इश्क ही तो हैं
कई आशिक यहां पर दफ़्न हैं कब्रों के सीनों में
یہ قبرستان سارے یادگار عشق ہی تو ہیں
کئی عاشق یہاں پر دفن ہیں قبروں کے سینوں میں

अगर बंदों में है तफरीक़ तो हैरान क्यों हो तुम
यहां तफरीक़ है खुतबों, ख़ुदाओं और दीनों में
اگر بندوں میں ہے تفریق تو حیران کیوں ہو تم
یہاں تفریق ہے کھتبوں، خداؤں اور دینوں میں

मेरा भी सब्र टूटे, ज़ब्त छूटे, जलजला आए
अभी तक क़ैद हैं सब अश्क मेरे आबगीनों में
میرا بھی صبر ٹوٹے، ضبط چھوٹے، جلجلا آئے
ابھی تک قید ہیں سب اشک میرے آبگینوں میں

तेरे अल्फाज़ क्या लहजे को भी मालूम हो काफ़िर
"अदब पहला करीना है मुहब्बत के करीनों में"
تیرے الپھاز کیا لہجے کو بھی معلوم ہو کافر
"ادب پہلا قرینہ ہے محبت کے قرینوں میں"

जगजीत काफ़िर جگجیت کافر

दफ़ीनों = छुपे हुए ख़ज़ाने, गहरे दबे हुए
आबगीनों = बारीक़ परत वाली काँच की बोतलें
क़रीना = शिष्टता, तमीज़, सलीका

Tuesday, July 21, 2020

परवाज़

फकत परवाज़ ही तक़मील-ए-हस्ती तो नहीं
परिंदा अपने बाल-ओ-पर से भी आज़ाद हो

जगजीत काफ़िर
فقط پرواز ہی تکمیل اے ہستی تو نہیں
پرندہ اپنے بال و پر سے بھی آزاد ہو
جگجیت کافر

Friday, May 8, 2020

ग़ज़ल ( ढूंढ रही है )

इक बुत है जिसे मेरी नज़र ढूंढ रही है
मुश्किल है मुलाकात मगर ढूंढ रही है
اک بت ہے جِسے میری نظر ڈھونڈھ رہی ہے
مشکل ہے ملاقات مگر ڈھونڈھ رہی ہے

लाखों में किसी एक के कांधों पे मिलेगा
वो सर कि जिसे अज़मत-ए-सर ढूंढ रही है
لاکھوں میں کِسی ایک کے کاندھوں پے ملےگا
وہ سر کے جِسے عظمتِ سر ڈھونڈھ رہی ہے

मंज़िल ने मेरे पाओं को चूमा है कई बार
मैं वो हूं जिसे गर्द-ए-सफ़र ढूंढ रही है
منزل نے میرے پاؤں کو چوما ہے کئی  بار
میں وہ ہوں ج؟سے گردِ سفر ڈھونڈھ رہی ہے

इक बार करो जंग में उस मां का तसव्वुर
जो फ़ौत हुआ लख़्ते जिगर ढूंढ रही है
اک بار کرو جنگ میں اُس ماں کا تصور
جو فوت ہوا لختِ جگر ڈھونڈھ رہی ہے

परवाज़ को बाक़ी हैं अभी और भी अम्बर 
हसरत मेरी अब ज़र्फ़ के पर ढूंढ रही है
پرواز کو باقی ہیں ابھی اور بھی امبر
حسرت میری اب ظرف کے پر ڈھونڈھ رہی ہے

इक रोज़ उदासी ने मेरा नाम सुना था
उस दिन से मुझे शाम-ओ-सहर ढूंढ रही है
اک روز اُداسی نے میرا نام سُنا  تھا
اس دِن سے مجھے شام و سحر ڈھونڈھ رہی ہے

ख़्वाहिश है बड़ी देर से काफ़िर की जबीं को
सजदे के लिए यार का दर ढूंढ रही है
خواہش ہے بڑی دیر سے کافر کی جبیں کو
سجدے کے لیے یار کا در دوند رہی ہے

जगजीत काफ़िर / جگجیت کافر

Friday, December 6, 2019

ग़ज़ल ( ज़िन्दगी से क्या मिला )

जिंदगी से क्या मिला, कुछ भी नहीं
इक मसाफ़त के सिवा कुछ भी नहीं

जो मेरा था वो भी मुझसे छिन गया
उसको पाकर क्या मिला कुछ भी नहीं

रहमतों के वक्त मैं हाज़िर न था
मेरे कासे में गिरा कुछ भी नहीं

गर जबीं से खुद को सजदा हो गया
खुद से खुद का फासिला कुछ भी नहीं

मयकशी का दर्द से रिश्ता है क्या
एक राहत के सिवा कुछ भी नहीं

वो खुदा है जो करे वो सब सही
और मेरी इल्तिज़ा कुछ भी नहीं

इश्क़ में बर्बाद काफ़िर हो गया
और फिर भी क्या गया, कुछ भी नहीं

जगजीत काफ़िर

Tuesday, October 22, 2019

ग़ज़ल ( डूबती मौजों में कश्ती जैसे साहिल पर मिले )

डूबती मौजों में कश्ती जैसे साहिल पर मिले 
सिलसिला हर बार दिल का दर्द से जाकर मिले

टूट कर आगोश में वो हमसे यूं आकर मिले 
खोल कर बाहें नदी को जिस तरह सागर मिले

ऐ ज़माने हक़ बयानी कब तुम्हें मंज़ूर थी 
हर मसीहा को तुम्हारे हाथ में पत्थर मिले

इस जहां में क्या शबाहत हो मेरे महबूब की
चांद तारे, फूल सब उस हुस्न से कमतर मिले

और चमकेगी यकीनन, दौर-ए-हाज़िर में ग़ज़ल
इल्म के सब तालिबों को गर कोई रहबर मिले

इश्क़ में काफ़िर को हासिल हो फना कुछ इस तरह
जिस तरह कुकनुस को जलकर इक नया पैकर मिले

जगजीत काफ़िर

शबाहत = एकरुपता, हमशक्ली
कुकनुस = एक पौराणिक पक्षी जो अपनी राख से पुनर्जीवित हो जाता है

Monday, October 7, 2019

ग़ज़ल ( ज़िन्दगी के नाम पर )

चंद सांसें ही मिली हैं, ज़िन्दगी के नाम पर
वो भी ज़ाया हो रही हैं, आशिक़ी के नाम पर

उसने जाना ही था मुझको, यूं अकेला छोड़ कर
कर गया तर्क-ए-तअल्लुक, बेबसी के नाम पर

इस मुहब्बत के लिए, मशकूर हूं मैं आप का
ये ग़ज़ल मैं कह रहा हूं, आप ही के नाम पर

इश्क है किसको ख़ुदा से, बस दिलों का ख़ौफ है
नाम की ही बंदगी है, बंदगी के नाम पर

रहनुमा के भेस में, ताजिर भरे हैं इल्म के
जो अंधेरे बेचते हैं, रौशनी के नाम पर

वो नज़ाकत, वो नफ़ासत, अब कहां बाकी रही
बहर ही तो निभ रही है, शायरी के नाम पर

उसने सीखे ही नहीं थे, तौर दुनिया के अभी
लुट गया काफ़िर जहां में, सादगी के नाम पर

जगजीत काफ़िर

तर्क-ए-तअल्लुक = रिश्ता तोड़ना
मशकूर = शुक्रगुज़ार
ताजिर = व्यापारी

چند سانسیں ہی ملی ہیں۔زندگی کے نام پر۔
وہ  بھی  زایہ  ھورہی  ہیں عاشقی کے نام پر۔

اس نے جانا ہی تھا ۔یوں اکیلے مجھے چھوڑ کر
کر گیا ترک تعلق  بے  بسی کے نام پر۔

اس محبت کیلئے  مشکور   ھوں میں آپ کا۔
یہ  غزل    میں   کہ  رھا ھوں ، آپ ہی کے نام پر۔

عشق  ھے   کس  کو  خدا سے ، بس دلوں کا خوف ھے۔
نام  کی  ہی  بندگی  ھے ۔بندگی  کے نام پر۔

راہنما   کے    بھیس   میں
تاجر بھرے  ہیں علم کے۔
جو اندھیرے بیچتے ہیں۔روشنیوں کے نام پر۔

وہ   نزاکت ، وہ   نفاست ، اب  کہاں  باقی  رہی۔
بحر  ہی  نبھ  رہی  ہے۔شاعری کے نام پر۔

اس  نے  سیکھے ہی  نہیں تھے ، تور  دنیا کے ابھی۔
لٹ  گیا  کافر  جہاں  میں،
سادگی  کے نام پر۔

#jagjitkaafir #kaafir

Sunday, September 15, 2019

ग़ज़ल ( और क्या है )

दर्दे-दिल है, शायरी है, और क्या है
अब यही तो ज़िन्दगी है, और क्या है

जो दुखों से हार जाए, टूट जाए
नाम ही का आदमी है, और क्या है

कत्ल होने जा रहा आशिक ये बोला
इक तमाशा आखिरी है, और क्या है

वो अयां है, फिर भी तू महरुम है जो
बस नज़र की तीरगी है, और क्या है

पाक़ इतना और क्या है इस जहां में
मेरी अम्मा की हंसी है, और क्या है

सांस भी ग़र लूं तो उसका नाम आए
इक मुसलसल बंदगी है, और क्या है

हासिल-ए-हस्ती न पूछो काफ़िरों से
इश्क़ है बस इश्क़ ही है, और क्या है

जगजीत काफ़िर

#jagjit_kaafir #kaafir
#jagjitkaafir

Friday, September 6, 2019

ग़ज़ल ( हबीब आकर )

हमारे हाल पे रोते हैं सब हबीब आकर
असीर-ए-ग़म को दवा दे कोई तबीब आकर

मेरी तलाश में कब से भटक रही थी जो
लिपट गई है बदन से मेरे सलीब आकर

खुदा के खौफ की बातें, वो ख़्वाब जन्नत के
सुना रहे हैं फसाने, मुझे ख़तीब आकर

तुम्हारे इश्क ने मुझसे, मुझी को मांगा था
बदन उतार दिया है तेरे करीब आकर

मिटा सका ना ख़ुदी को 'तेरी' तरह 'काफ़िर'
इस एक बात पे रोया मेरा रकीब आकर

जगजीत काफ़िर

असीर-ए-ग़म = prisoner of sorrow
ख़तीब = a preacher, a public speaker or Orator

तबीब = doctor, physician

Wednesday, August 28, 2019

ग़ज़ल (आंख में अश्क)

आंख में अश्क, दहकता हुआ सीना होगा
जब्र यह है कि इसी हाल में जीना होगा

उनसे कह दो कि वो गुफ़्तार का लहजा परखें
बात कहने का भी कोई तो करीना होगा

बज़्म-ए-हस्ती में, सभी जाम उठाने वालो
मौत जब पेश करे जाम तो पीना होगा

जिसकी आंखों के भंवर में है उभरता साहिल 
मेरे अनफ़ास को हासिल, वो सफ़ीना होगा

मेरी वहशत का तकाज़ा है कि अब मौत आए
होश कहता है  दिल-ओ-जान से जीना होगा

कौन आएगा भला मरहमे दिल को काफ़िर
ज़ख़्म-ए-उल्फ़त को यहां आप ही सीना होगा

जगजीत काफ़िर

Friday, August 23, 2019

ग़ज़ल ( हिम्मत किए बिना )

बैठे रहोगे गर यूं ही जुर्रत किए बिना
पाओगे कैसे मंजिलें हिम्मत किए बिना

ये मुफ़लिसी का ढोंग यूं करना फ़िज़ूल है
मिलता नहीं है रिज़्क तो मेहनत किए बिना

हमको क़ुबूल हैं सभी क़िस्मत के फैसले
खानाबदोश हो गए हिजरत किए बिना

आसां नहीं है इश्क यह, दरिया है आग का
कैसे करोगे पार तुम, जुर्रत किए बिना

आशिक भी इन दिनों यही कहता है हुस्न को
मुझको क़रार चाहिए मिन्नत किए बिना

सोचो ख़ुदा को कौन सा चेहरा दिखाएंगे
गर चल दिए ज़मीन को जन्नत किए बिना

दर से किसी फ़कीर के पाओगे किस तरह
दुनिया की सारी नेमतें, खिदमत किए बिना

काफ़िर को गर खुदा मिले सजदे में जा गिरे
होती है उसकी बंदगी जहमत किए बिना

जगजीत काफ़िर

Friday, August 16, 2019

ग़ज़ल ( अब शरारों को मत हवा देना )

अब शरारों को मत हवा देना
दश्त-ए-दिल को न यूं जला देना

तीरगी जो मिटा नहीं सकते
उन चिराग़ों को तुम बुझा देना

मैं फरिश्तों से बात करता हूं
इसके आगे की तुम दुआ देना

मेरी आंखों ने जो नहीं देखा
ख़्वाब ऐसा कोई दिखा देना

लौट आएगा जो भी अपना है
सिर्फ इक बार तुम सदा देना

दाग़ मिटते नहीं मुहब्बत के
वक्त को बात यह बता देना

फ़िक्र तुमको है सारी दुनिया की
मेरे ज़ख्मों की भी दवा देना

हुस्न-ए-जाना के पास बैठे हो
पैकर-ए-दिल को आइना देना

वो जो काफ़िर तुम्हारा आशिक था
हो सके तो उसे भुला देना

जगजीत काफ़िर

Tuesday, August 6, 2019

ग़ज़ल ( न कोई शिकवा नसीब से है )

न कोई शिकवा नसीब से है, न अब खुदा से कोई गिला है
ये कैसी रहमत हुई है मुझ पर, तुम्हारे जैसा सनम मिला है

फलक से उतरा, जुड़ा ज़मीं पर, मेरा तुम्हारा जो सिलसिला है
तुम्हारे पैकर में ढल के मुझको, इबादतों का सिला मिला है

महक रहा है ये सहने-गुलशन, बहार भी है इसी के दम से
रुको ज़रा तुम, अभी न तोड़ो, अभी अभी तो ये गुल खिला है

ये खुदपरस्ती का शौक इक दिन, निज़ाम-ए-दुनिया बिगाड़ देगा
न जाने कैसा ये फलसफा है, हर एक इसमें ही मुब्तिला है

वो अौर होंगे, जो फ़ुरकतों में, आबाद होकर फना हुए हैं
मुझे न पूछो तबाह हुआ तो, मुझे मुहब्बत में क्या मिला है

न जाने कितने बरस लगे हैं, मुझे तुम्हारे करीब आते
मेरे तुम्हारे मिलन में हमदम, बस अब ज़रा सा ही फासिला है

विसाले शब को घिरा रहूं मैं, तुम्हारी जुल्फों की चिलमनों में
इस एक हसरत के पीछे काफिर, तवील रातों का काफिला है

जगजीत काफ़िर

Thursday, November 1, 2018

ग़ज़ल

आसमां का सर झुकाते मेरे ये पर देखिए
आप भी परवाज़ मेरी आज़मा कर देखिए
آسمان کا سر جھکاتے میرے یہ پر دیکھیے
آپ بھی پرواز میری آزما کر دیکھیے
कौन कहता है ज़माने में नहीं सच का निशां
रक्स करता है सलीबों पर ये अक्सर देखिए
کون کہتا ہے زمانے میں نہیں سچ کا نشان
رقص کرتا ہے صلیبوں پر یہ اکثر دیکھیے
इश्क मेरा देख कर था रश्क मुझ से आपको
किस क़दर बर्बाद हूं अब मुझ को आकर देखिए
عشق میرا دیکھ کر تھا رشک مُجھسے آپکو
کس قدر برباد ہوں اب مجھ کو آکر دیکھیے
इश्क आदम औ ख़ुदा ही हर तरफ मामूद है
इस जमीं पर, आसमां पर, जिस जगह पर देखिए
عشق آدم و خدا ہے ہر طرف موڑ ہے
اس زمین پر آسمان پر جس جگہ پر دیکھیے
दर्द की कारीगरी को देखकर हैरान हूं
खुश्क पलकों के तले है अश्क का घर देखिए
درد کی کاریگری کو دیکھ کر حیران ہوں
خشک پلکوں کے تلے ہے عشق کا گھر دیکھیے
गर मुहब्बत में फनां होना वफ़ा की शर्त है
जान हाजिर है सनम इक बार कह कर देखिऐ
گر محبت میں فنا ہونا وفا کی شہرت ہے
جان حاضر ہے صنم ایک بار کہ کر دیکھیے

جگجیت کافر जगजीत काफ़िर