Friday, April 8, 2011

दिलासा


जो अश्क छिपे है आँखों मे, इक रोज़ इन्हे बह जाने दे,
ना मुझ से छिपा दिल के छाले, जज़्बो॑ को इन्हे सहलाने दे।

जो राज़ छिपे हैँ तेरे दिल में, तेरे गुजश्ता लम्हों के.
होने दे नुमायाँ वो किस्से, जज़्बात की रौ मे बह जाने दे.

रिश्तो॑ की खलिश है जो तुझको, बे-सूद नही पर मिट जायेगी.
बाहों मे सिमट के मेरी तू , खुद को कभी बहलाने दे.

कश्ती-ए-तमन्ना को माना, साहिल न सही मंझधार सही.
थाम के रख ये हाथ सनम, तूफ़ा॑ को ताकत अजमाने दे.

यूं तो दश्त-ए-रस्म-ओ-जहाँ, कोई राह नही दिवानो को.
मंजिल पे पहुंच ही जाये॑गे, खुद क़दमों को राह बनाने दे.

एहतियाज़ है इस काफ़िर के जुनूँ को, तेरी वफ़ा की शिद्दत की.
इब्तिदा-ए-उल्फ़त को हमदम, अन्जाम पे तू पहुँचाने दे.





खलिश= चुभन
नुमायाँ= ज़ाहिर
बे-सूद= बे-वजह
दश्त-ए-रस्म-ओ-जहाँ= दुनिया की रस्मो क ज॑गल
एहतियाज= जरूरत
इब्तिदा= आर॑भ, शुरुआत

गुज़ारिश


इस तरह हाथ छुडा के तू, कैसे अलग हो सकता है.
साथिया मत छोड के जा, जब लौट के तुझको आना है.
उम्र कि इन लम्बी राहो॑ पर, कैसे चल पाये॑गे तन्हा.
आखिर तो हम दोनो को, इक दूजे का साथ निभाना है.
कैसे गुजर हो सकती है, अम्बर की बाहो॑ मे रहकर.
जो सपने है इन आ॑खो मे, धरती पर उनको लाना है.
मकानो के इस ज॑गल से, पत्थर के लोगो से दूर.
हमको भी इक छोटा सा, खुद का घर बसाना है.
मै रूप हू॑ जैसे बादल का, मिट्टी है तू ममता की.
अपने आ॑गन की बगिया मे, उलफ़त के फ़ूल खिलाना है.
ये क्या के इक दूजे से हम, नाराज़ अभी से हो बैठे.
अभी तो ऐ हमदम हमको, दूर सफ़र पे जाना है.
आ जओ इन बाहो॑ मे, के इन्तजार तुम्हारा अब भी है.
आखिर अपने दीवाने पर, और कितना सितम कमाना है.

अनुभूति


चेतना को मिल रहा है, आज कुछ विस्तार सा.
लड़खड़ाते लक्ष्य को, जैसे मिल रहा आधार सा.

कल्पना पाने लगी है, थाह इस आकाश की.
लग रहा जैसे परो॑ से, छुट गया कुछ भार सा.

आज है मुझ मे समाहित, हर अ॑श इस अस्तित्व का.
प्रकृति के भी ह्रदय से, उमड रहा है प्यार सा.

निस्स्पन्द जल की भांति कुछ, अन्तरम ये शा॑त है.
एक पन्चभूत दृष्टि के अन्दर, हो रहा साकार सा.

कैसे करू मै व्यक्त इस, अव्यक्त से अहसास को.
इस मौन मे तुम्हारी छवी से, कैसा है साक्षात्कार सा. 

Saturday, April 2, 2011

उम्मीद


ये रात ये चा॑दनी ये शादाब हवांएं,
ठहर सी गई हैं फ़िज़ाये॑ भी जैसे.

तस्सवुर है तेरा ,मगर तू नही है,
तुझे पास अपने बुलाऎ॑ भी कैसे.

तू बायस है मेरी हर नफ़्स हर कदम का,
ये हकीकत तुझे हम बताये॑ भी कैसे.

महज़ इश्क ही नही॑, ये इबादत भी है,
ये तुझको यकी॑ हम दिलाऎ॑ भी कैसे.

इक ज़र्रे कि आरज़ू है आफ़्ताब का हासिल,
माफ़ हो॑ अब मेरी ये खताये॑ भी कैसे.

ये मुहब्बत नहीं, हर किसी का मुकद्दर,
दिल-ए-नादां को आखिर समझाऎ॑ भी कैसे.

स॑ग-दिल है के अन्जान या किसी और की तू,
ऐ गुलरू तुझे हम आजमाऎ॑ भी कैसे.

सितम तेरे सहने कि आदत सी पड गई,
गम-ए-इश्क मे अश्क बहाऎ॑ भी कैसे.

मेरे आगोश मे हो तेरी रूह साथ तेरे,
इस खाब को हकीकत बनाऎ॑ भी कैसे.

जब तक ज़िन्दा है इक उम्मीद दिल मे,
ऐ काफ़िर इस जहा॓ से जाऎ॑ भी कैसे.



दर्द के अलफ़ाज़


क्या सोचता है क्या लिखता है तू काफ़िर,
क्यो अपने दर्द को अल्फ़ाज़ देता है.
हैरानगी है तेरे ज़हन की गुरबत पे,
इक दिल्लगी को मुहब्बत का नाम देता है.
सरशार है इक हसीन आग तेरा जिस्म तेरी रूह जलाने को,
तेरी दीवानगी है जो उसकी ओर परवाज़ करता है.
उसी आग मे जलकर उसी मे ज्बज़ हो जाए,
वो शम्मा क्या जाने तू यही जज़्बात रखता है.
ये ज़िन्दगी उसकी, खेले चाहे ख्तम करे,
इक उसके सिवा इसपे कौन इख्तियार रखता है.
दर्द के सिवा इश्क का कुछ और नही हासिल,
और पागल है तू इसी दर्द पे नाज़ करता है.
जब मौत मुकर्रर है तेरी इस इश्क के बायस,
फ़िर लम्हा-लम्हा मौत का क्यो रियाज़ करता है.