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Friday, February 19, 2016

मैं रहता हूं

मैं ढूंढता रहता हूं, उन लम्हों को हमदम,
जिन लम्हों में मैं, मैं रहता हूं.
ये दिन गुज़रता है नकाब़ों के साये,
बस रात को ही मैं, मैं रहता हूं.
हर लम्हा ढूंढ रहा हूं खुशियों की बस्ती,
क्या जाने किस तलाश में, मैं रहता हूं.
मुझको नहीं यकीन इस बेबस निज़ाम पे,
इक तलाश-ए-वजूद में, मैं रहता हूं.
जाने वो कर सकूं, दिल में दबी है जो,
ख्वाहिशों के पेच-ओ-ताब में, मैं रहता हूं.
मेरे खुदा मुझे चाहे तो मौत दे दे,
काफिर हूं इस खुदी में भी, मैं रहता हूं.

Friday, October 16, 2015

मुन्तिज़र

चले आओ कि ये दिवारें, मुन्तिज़र हैं तुम्हारी।
मेरी तरह खड़ी हैं ये, बाहें पसार कर ।