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Friday, September 6, 2019

ग़ज़ल ( हबीब आकर )

हमारे हाल पे रोते हैं सब हबीब आकर
असीर-ए-ग़म को दवा दे कोई तबीब आकर

मेरी तलाश में कब से भटक रही थी जो
लिपट गई है बदन से मेरे सलीब आकर

खुदा के खौफ की बातें, वो ख़्वाब जन्नत के
सुना रहे हैं फसाने, मुझे ख़तीब आकर

तुम्हारे इश्क ने मुझसे, मुझी को मांगा था
बदन उतार दिया है तेरे करीब आकर

मिटा सका ना ख़ुदी को 'तेरी' तरह 'काफ़िर'
इस एक बात पे रोया मेरा रकीब आकर

जगजीत काफ़िर

असीर-ए-ग़म = prisoner of sorrow
ख़तीब = a preacher, a public speaker or Orator

तबीब = doctor, physician

Friday, August 16, 2019

ग़ज़ल ( अब शरारों को मत हवा देना )

अब शरारों को मत हवा देना
दश्त-ए-दिल को न यूं जला देना

तीरगी जो मिटा नहीं सकते
उन चिराग़ों को तुम बुझा देना

मैं फरिश्तों से बात करता हूं
इसके आगे की तुम दुआ देना

मेरी आंखों ने जो नहीं देखा
ख़्वाब ऐसा कोई दिखा देना

लौट आएगा जो भी अपना है
सिर्फ इक बार तुम सदा देना

दाग़ मिटते नहीं मुहब्बत के
वक्त को बात यह बता देना

फ़िक्र तुमको है सारी दुनिया की
मेरे ज़ख्मों की भी दवा देना

हुस्न-ए-जाना के पास बैठे हो
पैकर-ए-दिल को आइना देना

वो जो काफ़िर तुम्हारा आशिक था
हो सके तो उसे भुला देना

जगजीत काफ़िर

Tuesday, August 6, 2019

ग़ज़ल ( न कोई शिकवा नसीब से है )

न कोई शिकवा नसीब से है, न अब खुदा से कोई गिला है
ये कैसी रहमत हुई है मुझ पर, तुम्हारे जैसा सनम मिला है

फलक से उतरा, जुड़ा ज़मीं पर, मेरा तुम्हारा जो सिलसिला है
तुम्हारे पैकर में ढल के मुझको, इबादतों का सिला मिला है

महक रहा है ये सहने-गुलशन, बहार भी है इसी के दम से
रुको ज़रा तुम, अभी न तोड़ो, अभी अभी तो ये गुल खिला है

ये खुदपरस्ती का शौक इक दिन, निज़ाम-ए-दुनिया बिगाड़ देगा
न जाने कैसा ये फलसफा है, हर एक इसमें ही मुब्तिला है

वो अौर होंगे, जो फ़ुरकतों में, आबाद होकर फना हुए हैं
मुझे न पूछो तबाह हुआ तो, मुझे मुहब्बत में क्या मिला है

न जाने कितने बरस लगे हैं, मुझे तुम्हारे करीब आते
मेरे तुम्हारे मिलन में हमदम, बस अब ज़रा सा ही फासिला है

विसाले शब को घिरा रहूं मैं, तुम्हारी जुल्फों की चिलमनों में
इस एक हसरत के पीछे काफिर, तवील रातों का काफिला है

जगजीत काफ़िर

Friday, September 8, 2017

सरमाया

एक दिन उसने पूछा कि क्या है तेरे पास ?
और मैंने कहा :-

इन ठोकरों, इन हिकारतों को,
                     ज़िन्दगी में कमाया है
चन्द शिकवे, चन्द तल्खियों का,
                 तोहफा वक्त भी लाया है

भीगी आस्तीनों पर कुछ अश्क,
              आंखों में मौत का साया है
कुछ ग़म हैं मेरे अपने और,
                   थोड़ा सा दर्द पराया है

कुछ टूटे रिश्तों का रंज़,
                     हिस्से में मेरे आया है
सच कहता हूं थोड़ी सी,
         रूसवाईयों को भी कब्ज़ाया है

अधूरी सी कुछ ख्वाहिशों से,
                   इक आशियां बनाया है
कुछ टूटे बिखरे ख्वाबों से,
                दरो दीवार को सजाया है

कुछ फरेब मिले हैं अपनों से,
             गैरों का सितम भी पाया है
और कुछ अहले जहां का दर्द,
                  दामन में मेरे समाया है

फिलहाल तो ए काफ़िर मेरा,
              बस इतना ही सरमाया है
अभी थोड़े और ज़ख्मों की खातिर,
               मुकद्दर को आज़माया है

हिकारत = नफ़रत काफ़िर 18/07/2002

Thursday, February 17, 2011

हकीकत


अपने मुकद्दर की फ़ितरत से वाकिफ़ हूं मैं,
अपनी गुऱबत का भी मुझ को  अहसास है.
महज़ चन्द कतरे हैं हासिल मेरे लबों को,
और समन्दर की दिल मे दबी प्यास है.
सोचने का सबब हैं , ये कुर्बतें भी,
चन्द ही रोज़ की तो रफ़ाकत है तुमसे.
अपने लगते हो जब के हो गैर भी,
किस बिना पर कहूं के मोहब्बत है तुमसे.
मै हिरासां हूं ना टूट जाएं कहीं,
इन दिनो खाब जो तुम दिखाती हो मुझको.
तेरी आदत ही ना हो ये तेरा तब्बसुम,
बे-वजह तुम खिलोना बनाती हो मुझको.
पेश्कदमी से पहले ज़रा सोच लो तुम,
क्या अपने अहद को निभा भी सकोगी?
मेरे हमराज़ हैं मेरे माज़ी के साये,
इन अन्धेरों से खुद को बचा भी सकोगी ?