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Friday, August 23, 2019

ग़ज़ल ( हिम्मत किए बिना )

बैठे रहोगे गर यूं ही जुर्रत किए बिना
पाओगे कैसे मंजिलें हिम्मत किए बिना

ये मुफ़लिसी का ढोंग यूं करना फ़िज़ूल है
मिलता नहीं है रिज़्क तो मेहनत किए बिना

हमको क़ुबूल हैं सभी क़िस्मत के फैसले
खानाबदोश हो गए हिजरत किए बिना

आसां नहीं है इश्क यह, दरिया है आग का
कैसे करोगे पार तुम, जुर्रत किए बिना

आशिक भी इन दिनों यही कहता है हुस्न को
मुझको क़रार चाहिए मिन्नत किए बिना

सोचो ख़ुदा को कौन सा चेहरा दिखाएंगे
गर चल दिए ज़मीन को जन्नत किए बिना

दर से किसी फ़कीर के पाओगे किस तरह
दुनिया की सारी नेमतें, खिदमत किए बिना

काफ़िर को गर खुदा मिले सजदे में जा गिरे
होती है उसकी बंदगी जहमत किए बिना

जगजीत काफ़िर

Sunday, July 17, 2016

सवाल

ये जो मसरूफ है तेरी इबादत में,
हर ज़र्रा कायनात का ।
फिर क्यों है गुजश्ता दोज़ख सी,
ज़िन्दगी इंसान की ?