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Tuesday, August 6, 2019

ग़ज़ल ( न कोई शिकवा नसीब से है )

न कोई शिकवा नसीब से है, न अब खुदा से कोई गिला है
ये कैसी रहमत हुई है मुझ पर, तुम्हारे जैसा सनम मिला है

फलक से उतरा, जुड़ा ज़मीं पर, मेरा तुम्हारा जो सिलसिला है
तुम्हारे पैकर में ढल के मुझको, इबादतों का सिला मिला है

महक रहा है ये सहने-गुलशन, बहार भी है इसी के दम से
रुको ज़रा तुम, अभी न तोड़ो, अभी अभी तो ये गुल खिला है

ये खुदपरस्ती का शौक इक दिन, निज़ाम-ए-दुनिया बिगाड़ देगा
न जाने कैसा ये फलसफा है, हर एक इसमें ही मुब्तिला है

वो अौर होंगे, जो फ़ुरकतों में, आबाद होकर फना हुए हैं
मुझे न पूछो तबाह हुआ तो, मुझे मुहब्बत में क्या मिला है

न जाने कितने बरस लगे हैं, मुझे तुम्हारे करीब आते
मेरे तुम्हारे मिलन में हमदम, बस अब ज़रा सा ही फासिला है

विसाले शब को घिरा रहूं मैं, तुम्हारी जुल्फों की चिलमनों में
इस एक हसरत के पीछे काफिर, तवील रातों का काफिला है

जगजीत काफ़िर

Thursday, June 9, 2016

कहानी

कौन समझा है इश्क को काफिर, बड़ी बे-रब्त कहानी है।
इसे अक्ल समझ ना पाएगी, ये दिल की ज़ुबानी है।

Friday, May 6, 2016

ज़िंदगी

ज़िंदगी हिसाब का सवाल है, कुछ और नहीं ।
इक जानलेवा बवाल है, कुछ और नहीं ।
साल तो बढते हैं, और उम्र घटती जाती है ।
वक्त के ज़र्ब का कमाल है, कुछ और नहीं ।
ये सोचना बशर का, मुकम्मल इसको जान लूं।
सिर्फ ख्याल ही ख्याल है, कुछ और नहीं ।
हर एक शख्स जो, हंसता नज़र आता है,
एक सुलगता सा निहाल है, कुछ और नहीं ।
ये रिश्ते, ये जज़्बे, ये रूतबे, ये निज़ाम,
इंसानी फितरत के जाल हैं, कुछ और नहीं ।
हर चीज़ है मयस्सर, इंसान को जहां में,
बस मौत ही मुहाल है, कुछ और नहीं ।
खुद को खिज़्र ना समझ ऐ काफिर तू,
फनां के तह-ए-बाल है, कुछ और नहीं ।

बवाल = मुसीबत
बशर = इंसान
निहाल = पेड़
मयस्सर = हासिल
मुहाल = मुश्किल
खिज़्र = एक अवतार जो अमर हैं
फनां = मौत
तह-ए-बाल = कैद में
निज़ाम = व्यवस्था

Monday, August 31, 2015

एक मुलाकात

जाने क्यों खामोश इतनी ये रात है।
बे-तरह आंसुओं की क्यों बरसात है।
मेरे आग़ोश में बस तू ही नहीं,
कहने को तो सारी कायनात है।
पेश है तू मुझसे, किसी ग़ैर की तरह,
इक अजीब आखिरी सी ये मुलाकात है।
तेरी बेरूखी की मैं वजह पूछता हूं,
कहते हो तुम कि ये बे-बात है।
तेरा हर सितम है कुबूल हमनशीं,
तेरे सामने मेरी क्या बिसात है।
लरज़ते हैं होंठ, कुछ कहते भी नहीं,
तेरे ता-ब-लब , कुछ ऐसी बात है।
गीली सिसकीयां कोइ और सुन ना ले,
रोने में भी कैसी ये एहतियात है।
लौट भी गये तुम, कहकर सब निगाह से,
काफिर ये कैसी इश्क की वारदात है।

बे-तरह = बुरी तरह से
कायनात = दुनिया
ता-ब-लब = होठों पर
एहतियात = सावधानी
लरज़ते = कांपते

Wednesday, March 16, 2011

याद


हर आहट पे दौड उठते थे दरवाजे की ओर हम,
उनका या उनके खत का हमें इन्तज़ार था.
हमारी तमाम उम्र गयी इन आंखो के रास्ते,
जाने कब नसीब-ए-चश्म मे उनका दीदार था.
हासिल कहां था कदमो को उनकी गली का मोड़,
सुनाते भी किस तरह जो हाल-ए-करार था.
पहरे थे हमारी हस्ती पर निगाह-ए-जहान के,
आना हमारा उन को भी कुछ ना-गवार था.
हमको वहम था कुर्बत का उन की अदाओं से,
ये तबस्सुम तो उनकी आदत में कब से शुमार था.
दिल मे यही थी आरज़ू के मिलते कभी उन्हे,
तफ़्सील से निकलता जो दिल में गुबा़र था.
करते दुआ भी कैसे हम उनके विसाल की,
हम को खुदा पे पहले ही कब ऐतबार था.
तर्क-ए-अज़ार-ए-इश्क की नसीहत किये सभी,
क्या कहिये के इसमे काफ़िर ये बे-इख्तयार था.
चश्म = नज़र
कुर्बत = नज्दीकी
तबस्सुम = मुस्कान
तफ़्सील = विस्तार
विसाल = मिलन
अज़ार= रोग
तर्क = छोडना