Wednesday, April 7, 2021
ग़ज़ल ( ज़मीनों में )
Wednesday, June 24, 2020
ग़ज़ल (मुश्किल है)
Tuesday, October 22, 2019
ग़ज़ल ( डूबती मौजों में कश्ती जैसे साहिल पर मिले )
Sunday, September 15, 2019
ग़ज़ल ( और क्या है )
दर्दे-दिल है, शायरी है, और क्या है
अब यही तो ज़िन्दगी है, और क्या है
जो दुखों से हार जाए, टूट जाए
नाम ही का आदमी है, और क्या है
कत्ल होने जा रहा आशिक ये बोला
इक तमाशा आखिरी है, और क्या है
वो अयां है, फिर भी तू महरुम है जो
बस नज़र की तीरगी है, और क्या है
पाक़ इतना और क्या है इस जहां में
मेरी अम्मा की हंसी है, और क्या है
सांस भी ग़र लूं तो उसका नाम आए
इक मुसलसल बंदगी है, और क्या है
हासिल-ए-हस्ती न पूछो काफ़िरों से
इश्क़ है बस इश्क़ ही है, और क्या है
जगजीत काफ़िर
#jagjit_kaafir #kaafir
#jagjitkaafir
Wednesday, August 28, 2019
ग़ज़ल (आंख में अश्क)
आंख में अश्क, दहकता हुआ सीना होगा
जब्र यह है कि इसी हाल में जीना होगा
उनसे कह दो कि वो गुफ़्तार का लहजा परखें
बात कहने का भी कोई तो करीना होगा
बज़्म-ए-हस्ती में, सभी जाम उठाने वालो
मौत जब पेश करे जाम तो पीना होगा
जिसकी आंखों के भंवर में है उभरता साहिल
मेरे अनफ़ास को हासिल, वो सफ़ीना होगा
मेरी वहशत का तकाज़ा है कि अब मौत आए
होश कहता है दिल-ओ-जान से जीना होगा
कौन आएगा भला मरहमे दिल को काफ़िर
ज़ख़्म-ए-उल्फ़त को यहां आप ही सीना होगा
जगजीत काफ़िर
Friday, August 16, 2019
ग़ज़ल ( अब शरारों को मत हवा देना )
अब शरारों को मत हवा देना
दश्त-ए-दिल को न यूं जला देना
तीरगी जो मिटा नहीं सकते
उन चिराग़ों को तुम बुझा देना
मैं फरिश्तों से बात करता हूं
इसके आगे की तुम दुआ देना
मेरी आंखों ने जो नहीं देखा
ख़्वाब ऐसा कोई दिखा देना
लौट आएगा जो भी अपना है
सिर्फ इक बार तुम सदा देना
दाग़ मिटते नहीं मुहब्बत के
वक्त को बात यह बता देना
फ़िक्र तुमको है सारी दुनिया की
मेरे ज़ख्मों की भी दवा देना
हुस्न-ए-जाना के पास बैठे हो
पैकर-ए-दिल को आइना देना
वो जो काफ़िर तुम्हारा आशिक था
हो सके तो उसे भुला देना
जगजीत काफ़िर
Thursday, November 1, 2018
ग़ज़ल
आसमां का सर झुकाते मेरे ये पर देखिए
आप भी परवाज़ मेरी आज़मा कर देखिए
آسمان کا سر جھکاتے میرے یہ پر دیکھیے
آپ بھی پرواز میری آزما کر دیکھیے
कौन कहता है ज़माने में नहीं सच का निशां
रक्स करता है सलीबों पर ये अक्सर देखिए
کون کہتا ہے زمانے میں نہیں سچ کا نشان
رقص کرتا ہے صلیبوں پر یہ اکثر دیکھیے
इश्क मेरा देख कर था रश्क मुझ से आपको
किस क़दर बर्बाद हूं अब मुझ को आकर देखिए
عشق میرا دیکھ کر تھا رشک مُجھسے آپکو
کس قدر برباد ہوں اب مجھ کو آکر دیکھیے
इश्क आदम औ ख़ुदा ही हर तरफ मामूद है
इस जमीं पर, आसमां पर, जिस जगह पर देखिए
عشق آدم و خدا ہے ہر طرف موڑ ہے
اس زمین پر آسمان پر جس جگہ پر دیکھیے
दर्द की कारीगरी को देखकर हैरान हूं
खुश्क पलकों के तले है अश्क का घर देखिए
درد کی کاریگری کو دیکھ کر حیران ہوں
خشک پلکوں کے تلے ہے عشق کا گھر دیکھیے
गर मुहब्बत में फनां होना वफ़ा की शर्त है
जान हाजिर है सनम इक बार कह कर देखिऐ
گر محبت میں فنا ہونا وفا کی شہرت ہے
جان حاضر ہے صنم ایک بار کہ کر دیکھیے
جگجیت کافر जगजीत काफ़िर
Friday, September 8, 2017
सरमाया
एक दिन उसने पूछा कि क्या है तेरे पास ?
और मैंने कहा :-
इन ठोकरों, इन हिकारतों को,
ज़िन्दगी में कमाया है
चन्द शिकवे, चन्द तल्खियों का,
तोहफा वक्त भी लाया है
भीगी आस्तीनों पर कुछ अश्क,
आंखों में मौत का साया है
कुछ ग़म हैं मेरे अपने और,
थोड़ा सा दर्द पराया है
कुछ टूटे रिश्तों का रंज़,
हिस्से में मेरे आया है
सच कहता हूं थोड़ी सी,
रूसवाईयों को भी कब्ज़ाया है
अधूरी सी कुछ ख्वाहिशों से,
इक आशियां बनाया है
कुछ टूटे बिखरे ख्वाबों से,
दरो दीवार को सजाया है
कुछ फरेब मिले हैं अपनों से,
गैरों का सितम भी पाया है
और कुछ अहले जहां का दर्द,
दामन में मेरे समाया है
फिलहाल तो ए काफ़िर मेरा,
बस इतना ही सरमाया है
अभी थोड़े और ज़ख्मों की खातिर,
मुकद्दर को आज़माया है
हिकारत = नफ़रत काफ़िर 18/07/2002
Saturday, June 11, 2016
मैं क्या हूं ?
मैं खुदी में क्या हूं और गफलत में क्या हूं ।
जलवत में क्या हूं और खिलवत में क्या हूं।
चेहरे बहुत हैं हर इक फरद खातिर,
ना जाने कोई के हकीकत में क्या हूं ।
तुम समझते हो के जानते हो मुझे तुम,
नहीं जानते किस फितरत में क्या हूं ।
बरसों हुए ढूंढता हूं खुदी को,
एै काफिर बता किस हालत में क्या हूं ।
Thursday, June 9, 2016
Sunday, May 15, 2016
Friday, May 6, 2016
ज़िंदगी
ज़िंदगी हिसाब का सवाल है, कुछ और नहीं ।
इक जानलेवा बवाल है, कुछ और नहीं ।
साल तो बढते हैं, और उम्र घटती जाती है ।
वक्त के ज़र्ब का कमाल है, कुछ और नहीं ।
ये सोचना बशर का, मुकम्मल इसको जान लूं।
सिर्फ ख्याल ही ख्याल है, कुछ और नहीं ।
हर एक शख्स जो, हंसता नज़र आता है,
एक सुलगता सा निहाल है, कुछ और नहीं ।
ये रिश्ते, ये जज़्बे, ये रूतबे, ये निज़ाम,
इंसानी फितरत के जाल हैं, कुछ और नहीं ।
हर चीज़ है मयस्सर, इंसान को जहां में,
बस मौत ही मुहाल है, कुछ और नहीं ।
खुद को खिज़्र ना समझ ऐ काफिर तू,
फनां के तह-ए-बाल है, कुछ और नहीं ।
बवाल = मुसीबत
बशर = इंसान
निहाल = पेड़
मयस्सर = हासिल
मुहाल = मुश्किल
खिज़्र = एक अवतार जो अमर हैं
फनां = मौत
तह-ए-बाल = कैद में
निज़ाम = व्यवस्था
Friday, February 19, 2016
मैं रहता हूं
मैं ढूंढता रहता हूं, उन लम्हों को हमदम,
जिन लम्हों में मैं, मैं रहता हूं.
ये दिन गुज़रता है नकाब़ों के साये,
बस रात को ही मैं, मैं रहता हूं.
हर लम्हा ढूंढ रहा हूं खुशियों की बस्ती,
क्या जाने किस तलाश में, मैं रहता हूं.
मुझको नहीं यकीन इस बेबस निज़ाम पे,
इक तलाश-ए-वजूद में, मैं रहता हूं.
जाने वो कर सकूं, दिल में दबी है जो,
ख्वाहिशों के पेच-ओ-ताब में, मैं रहता हूं.
मेरे खुदा मुझे चाहे तो मौत दे दे,
काफिर हूं इस खुदी में भी, मैं रहता हूं.
Monday, August 31, 2015
एक मुलाकात
जाने क्यों खामोश इतनी ये रात है।
बे-तरह आंसुओं की क्यों बरसात है।
मेरे आग़ोश में बस तू ही नहीं,
कहने को तो सारी कायनात है।
पेश है तू मुझसे, किसी ग़ैर की तरह,
इक अजीब आखिरी सी ये मुलाकात है।
तेरी बेरूखी की मैं वजह पूछता हूं,
कहते हो तुम कि ये बे-बात है।
तेरा हर सितम है कुबूल हमनशीं,
तेरे सामने मेरी क्या बिसात है।
लरज़ते हैं होंठ, कुछ कहते भी नहीं,
तेरे ता-ब-लब , कुछ ऐसी बात है।
गीली सिसकीयां कोइ और सुन ना ले,
रोने में भी कैसी ये एहतियात है।
लौट भी गये तुम, कहकर सब निगाह से,
काफिर ये कैसी इश्क की वारदात है।
बे-तरह = बुरी तरह से
कायनात = दुनिया
ता-ब-लब = होठों पर
एहतियात = सावधानी
लरज़ते = कांपते
Friday, April 8, 2011
दिलासा
जो अश्क छिपे है आँखों मे, इक रोज़ इन्हे बह जाने दे,
ना मुझ से छिपा दिल के छाले, जज़्बो॑ को इन्हे सहलाने दे।
जो राज़ छिपे हैँ तेरे दिल में, तेरे गुजश्ता लम्हों के.
होने दे नुमायाँ वो किस्से, जज़्बात की रौ मे बह जाने दे.
रिश्तो॑ की खलिश है जो तुझको, बे-सूद नही पर मिट जायेगी.
बाहों मे सिमट के मेरी तू , खुद को कभी बहलाने दे.
कश्ती-ए-तमन्ना को माना, साहिल न सही मंझधार सही.
थाम के रख ये हाथ सनम, तूफ़ा॑ को ताकत अजमाने दे.
यूं तो दश्त-ए-रस्म-ओ-जहाँ, कोई राह नही दिवानो को.
मंजिल पे पहुंच ही जाये॑गे, खुद क़दमों को राह बनाने दे.
एहतियाज़ है इस काफ़िर के जुनूँ को, तेरी वफ़ा की शिद्दत की.
इब्तिदा-ए-उल्फ़त को हमदम, अन्जाम पे तू पहुँचाने दे.
खलिश= चुभन
नुमायाँ= ज़ाहिर
बे-सूद= बे-वजह
दश्त-ए-रस्म-ओ-जहाँ= दुनिया की रस्मो क ज॑गल
एहतियाज= जरूरत
इब्तिदा= आर॑भ, शुरुआत
Thursday, March 17, 2011
तेरे ख्याल में...
गुज़र गई है ये रात भी, तेरे ख्याल में.
मदहोश था मैं बहका-बहका, तेरे ख्याल में.
मुझको कहा॑ मयस्सर था, मन्ज़र दीदार का.
हासिल हुआ विसाल तेरा, तेरे ख्याल में.
आती हो मेरे पास तो, खाबों मे रोज तुम.
आता हू॑ क्या कभी मैं भी, तेरे ख्याल में ?
हैरत है तुझको रन्ज़ है, हाल-ए-तबाह का.
तू ही बता हयात क्या है, तेरे ख्याल में.
पहले कहा॑ थी शिद्दत इतनी, खिलवत के ख्याल में.
बढती ही जा रही है अब, तेरे ख्याल में.
अलविदा कइ बार बोला, गम गुबार ओर अश्क को.
चले आते हैं फ़िर दोबारा ये, तेरे ख्याल में.
ये काफ़िर जो भूल पाएगा ना, तुझ को तमाम उम्र.
दीवाना सा हो चला है अब, तेरे ख्याल में.
मयस्सर= हासिल
विसाल= मिलन
हयात= ज़िन्दगी, जीवन
खिलवत= तन्हाई
Wednesday, March 16, 2011
याद
हर आहट पे दौड उठते थे दरवाजे की ओर हम,
उनका या उनके खत का हमें इन्तज़ार था.
हमारी तमाम उम्र गयी इन आंखो के रास्ते,
जाने कब नसीब-ए-चश्म मे उनका दीदार था.
हासिल कहां था कदमो को उनकी गली का मोड़,
सुनाते भी किस तरह जो हाल-ए-करार था.
पहरे थे हमारी हस्ती पर निगाह-ए-जहान के,
आना हमारा उन को भी कुछ ना-गवार था.
हमको वहम था कुर्बत का उन की अदाओं से,
ये तबस्सुम तो उनकी आदत में कब से शुमार था.
दिल मे यही थी आरज़ू के मिलते कभी उन्हे,
तफ़्सील से निकलता जो दिल में गुबा़र था.
करते दुआ भी कैसे हम उनके विसाल की,
हम को खुदा पे पहले ही कब ऐतबार था.
तर्क-ए-अज़ार-ए-इश्क की नसीहत किये सभी,
क्या कहिये के इसमे काफ़िर ये बे-इख्तयार था.
चश्म = नज़र
कुर्बत = नज्दीकी
तबस्सुम = मुस्कान
तफ़्सील = विस्तार
विसाल = मिलन
अज़ार= रोग
तर्क = छोडना
रिश्ते
रिश्ते ये रिसते रहते हैं नासूर की तरह,
पडते हैं ये निभाने किसी दस्तूर की तरह.
जाएं भी कैसे तोड़ कर बन्धन निज़ाम के,
इसके आगे हम भी हैं मजबूर बे-तरह.
जीना तो यहा पर पड़ता है हर तन्ज़ को सह कर भी,
जिये जा रहे हैं शिकश्ते-चूर की तरह.
कैसे करें मन्ज़ूर हम अपनी हकीकत ये,
निगाह-ए-अहले जहान मे ना-मन्ज़ूर की तरह.
अपनी भी हस्ति का सितारा था कभी बुलंद,
रह गये हैं होकर हम बे-नूर बे-तरह.
क्यों आये इस आलम में क्या हासिल हस्ति का,
जाते हैं काफ़िर जहान से बद-मकदूर की तरह
निज़ाम = वय्वस्था
बे-तरह = बहुत ज्यादा
तन्ज़ = ताना
बद-मकदूर = बद-नसीब
Thursday, February 17, 2011
हकीकत
अपने मुकद्दर की फ़ितरत से वाकिफ़ हूं मैं,
अपनी गुऱबत का भी मुझ को अहसास है.
महज़ चन्द कतरे हैं हासिल मेरे लबों को,
और समन्दर की दिल मे दबी प्यास है.
सोचने का सबब हैं , ये कुर्बतें भी,
चन्द ही रोज़ की तो रफ़ाकत है तुमसे.
अपने लगते हो जब के हो गैर भी,
किस बिना पर कहूं के मोहब्बत है तुमसे.
मै हिरासां हूं ना टूट जाएं कहीं,
इन दिनो खाब जो तुम दिखाती हो मुझको.
तेरी आदत ही ना हो ये तेरा तब्बसुम,
बे-वजह तुम खिलोना बनाती हो मुझको.
पेश्कदमी से पहले ज़रा सोच लो तुम,
क्या अपने अहद को निभा भी सकोगी?
मेरे हमराज़ हैं मेरे माज़ी के साये,
इन अन्धेरों से खुद को बचा भी सकोगी ?