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Sunday, September 15, 2019

ग़ज़ल ( और क्या है )

दर्दे-दिल है, शायरी है, और क्या है
अब यही तो ज़िन्दगी है, और क्या है

जो दुखों से हार जाए, टूट जाए
नाम ही का आदमी है, और क्या है

कत्ल होने जा रहा आशिक ये बोला
इक तमाशा आखिरी है, और क्या है

वो अयां है, फिर भी तू महरुम है जो
बस नज़र की तीरगी है, और क्या है

पाक़ इतना और क्या है इस जहां में
मेरी अम्मा की हंसी है, और क्या है

सांस भी ग़र लूं तो उसका नाम आए
इक मुसलसल बंदगी है, और क्या है

हासिल-ए-हस्ती न पूछो काफ़िरों से
इश्क़ है बस इश्क़ ही है, और क्या है

जगजीत काफ़िर

#jagjit_kaafir #kaafir
#jagjitkaafir

Tuesday, August 6, 2019

ग़ज़ल ( न कोई शिकवा नसीब से है )

न कोई शिकवा नसीब से है, न अब खुदा से कोई गिला है
ये कैसी रहमत हुई है मुझ पर, तुम्हारे जैसा सनम मिला है

फलक से उतरा, जुड़ा ज़मीं पर, मेरा तुम्हारा जो सिलसिला है
तुम्हारे पैकर में ढल के मुझको, इबादतों का सिला मिला है

महक रहा है ये सहने-गुलशन, बहार भी है इसी के दम से
रुको ज़रा तुम, अभी न तोड़ो, अभी अभी तो ये गुल खिला है

ये खुदपरस्ती का शौक इक दिन, निज़ाम-ए-दुनिया बिगाड़ देगा
न जाने कैसा ये फलसफा है, हर एक इसमें ही मुब्तिला है

वो अौर होंगे, जो फ़ुरकतों में, आबाद होकर फना हुए हैं
मुझे न पूछो तबाह हुआ तो, मुझे मुहब्बत में क्या मिला है

न जाने कितने बरस लगे हैं, मुझे तुम्हारे करीब आते
मेरे तुम्हारे मिलन में हमदम, बस अब ज़रा सा ही फासिला है

विसाले शब को घिरा रहूं मैं, तुम्हारी जुल्फों की चिलमनों में
इस एक हसरत के पीछे काफिर, तवील रातों का काफिला है

जगजीत काफ़िर

Thursday, March 17, 2011

तेरे ख्याल में...


गुज़र गई है ये रात भी, तेरे ख्याल में.
मदहोश था मैं बहका-बहका, तेरे ख्याल में.
मुझको कहा॑ मयस्सर था, मन्ज़र दीदार का.
हासिल हुआ विसाल तेरा, तेरे ख्याल में.
आती हो मेरे पास तो, खाबों मे रोज तुम.
आता हू॑ क्या कभी मैं भी, तेरे ख्याल में ?
हैरत है तुझको रन्ज़ है, हाल-ए-तबाह का.
तू ही बता हयात क्या है, तेरे ख्याल में.
पहले कहा॑ थी शिद्दत इतनी, खिलवत के ख्याल में.
बढती ही जा रही है अब, तेरे ख्याल में.
अलविदा कइ बार बोला, गम गुबार ओर अश्क को.
चले आते हैं फ़िर दोबारा ये, तेरे ख्याल में.
ये काफ़िर जो भूल पाएगा ना, तुझ को तमाम उम्र.
दीवाना सा हो चला है अब, तेरे ख्याल में.


मयस्सर= हासिल
विसाल= मिलन
हयात= ज़िन्दगी, जीवन
खिलवत= तन्हाई

Wednesday, March 16, 2011

याद


हर आहट पे दौड उठते थे दरवाजे की ओर हम,
उनका या उनके खत का हमें इन्तज़ार था.
हमारी तमाम उम्र गयी इन आंखो के रास्ते,
जाने कब नसीब-ए-चश्म मे उनका दीदार था.
हासिल कहां था कदमो को उनकी गली का मोड़,
सुनाते भी किस तरह जो हाल-ए-करार था.
पहरे थे हमारी हस्ती पर निगाह-ए-जहान के,
आना हमारा उन को भी कुछ ना-गवार था.
हमको वहम था कुर्बत का उन की अदाओं से,
ये तबस्सुम तो उनकी आदत में कब से शुमार था.
दिल मे यही थी आरज़ू के मिलते कभी उन्हे,
तफ़्सील से निकलता जो दिल में गुबा़र था.
करते दुआ भी कैसे हम उनके विसाल की,
हम को खुदा पे पहले ही कब ऐतबार था.
तर्क-ए-अज़ार-ए-इश्क की नसीहत किये सभी,
क्या कहिये के इसमे काफ़िर ये बे-इख्तयार था.
चश्म = नज़र
कुर्बत = नज्दीकी
तबस्सुम = मुस्कान
तफ़्सील = विस्तार
विसाल = मिलन
अज़ार= रोग
तर्क = छोडना