ये जो मसरूफ है तेरी इबादत में,
हर ज़र्रा कायनात का ।
फिर क्यों है गुजश्ता दोज़ख सी,
ज़िन्दगी इंसान की ?
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Sunday, July 17, 2016
सवाल
Sunday, June 12, 2016
बग़ावत
जिस्मों के बाज़ार में जब जरूरत बिकती है,
गर्म सांसो की तपिश से जब रूह पिघलती है,
हवस अपने नकाब से जब बाहर निकलती है,
एक कुचला जिस्म इस निज़ाम का मूंह चिढाता है।
मज़हब के नाम पर जब खून बहता है,
हमसाये से भी कोई दिल ही दिल में डरता है,
इंसान जब वहशत का हमनाम बनता है,
तब शायद कहीं कोई खुदा अश्क बहाता है।
जिन्दगी जब जन्म लेकर बचपन खोती है,
कूड़े में इक निवाले की तलाश होती है,
नंगे बदन हर मौसम की शुरूआत होती है,
अंधी गलियों में हमारा कल मुंह छुपाता है।
बुनियादी ज़रूरतों को जब अवाम तरसता है,
दिलों का ग़ुबार जब आंखो से टपकता है,
इंसान की बेबसी पर जब लहू मचलता है,
काफिर लफ्ज़ों से बग़ावत की बुनियाद बनाता है।
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