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Friday, September 6, 2019

ग़ज़ल ( हबीब आकर )

हमारे हाल पे रोते हैं सब हबीब आकर
असीर-ए-ग़म को दवा दे कोई तबीब आकर

मेरी तलाश में कब से भटक रही थी जो
लिपट गई है बदन से मेरे सलीब आकर

खुदा के खौफ की बातें, वो ख़्वाब जन्नत के
सुना रहे हैं फसाने, मुझे ख़तीब आकर

तुम्हारे इश्क ने मुझसे, मुझी को मांगा था
बदन उतार दिया है तेरे करीब आकर

मिटा सका ना ख़ुदी को 'तेरी' तरह 'काफ़िर'
इस एक बात पे रोया मेरा रकीब आकर

जगजीत काफ़िर

असीर-ए-ग़म = prisoner of sorrow
ख़तीब = a preacher, a public speaker or Orator

तबीब = doctor, physician

Wednesday, March 16, 2011

याद


हर आहट पे दौड उठते थे दरवाजे की ओर हम,
उनका या उनके खत का हमें इन्तज़ार था.
हमारी तमाम उम्र गयी इन आंखो के रास्ते,
जाने कब नसीब-ए-चश्म मे उनका दीदार था.
हासिल कहां था कदमो को उनकी गली का मोड़,
सुनाते भी किस तरह जो हाल-ए-करार था.
पहरे थे हमारी हस्ती पर निगाह-ए-जहान के,
आना हमारा उन को भी कुछ ना-गवार था.
हमको वहम था कुर्बत का उन की अदाओं से,
ये तबस्सुम तो उनकी आदत में कब से शुमार था.
दिल मे यही थी आरज़ू के मिलते कभी उन्हे,
तफ़्सील से निकलता जो दिल में गुबा़र था.
करते दुआ भी कैसे हम उनके विसाल की,
हम को खुदा पे पहले ही कब ऐतबार था.
तर्क-ए-अज़ार-ए-इश्क की नसीहत किये सभी,
क्या कहिये के इसमे काफ़िर ये बे-इख्तयार था.
चश्म = नज़र
कुर्बत = नज्दीकी
तबस्सुम = मुस्कान
तफ़्सील = विस्तार
विसाल = मिलन
अज़ार= रोग
तर्क = छोडना

रिश्ते


रिश्ते ये रिसते रहते हैं नासूर की तरह,
पडते हैं ये निभाने किसी दस्तूर की तरह.
जाएं भी कैसे तोड़ कर बन्धन निज़ाम के,
इसके आगे हम भी हैं मजबूर बे-तरह.
जीना तो यहा पर पड़ता है हर तन्ज़ को सह कर भी,
जिये जा रहे हैं शिकश्ते-चूर की तरह.
कैसे करें मन्ज़ूर हम अपनी हकीकत ये,
निगाह-ए-अहले जहान मे ना-मन्ज़ूर की तरह.
अपनी भी हस्ति का सितारा था कभी बुलंद,
रह गये हैं होकर हम बे-नूर बे-तरह.
क्यों आये इस आलम में क्या हासिल हस्ति का,
जाते हैं काफ़िर जहान से बद-मकदूर की तरह


निज़ाम = वय्वस्था
बे-तरह = बहुत ज्यादा
तन्ज़ = ताना
बद-मकदूर = बद-नसीब