Showing posts with label काफिर. Show all posts
Showing posts with label काफिर. Show all posts

Monday, October 7, 2019

ग़ज़ल ( ज़िन्दगी के नाम पर )

चंद सांसें ही मिली हैं, ज़िन्दगी के नाम पर
वो भी ज़ाया हो रही हैं, आशिक़ी के नाम पर

उसने जाना ही था मुझको, यूं अकेला छोड़ कर
कर गया तर्क-ए-तअल्लुक, बेबसी के नाम पर

इस मुहब्बत के लिए, मशकूर हूं मैं आप का
ये ग़ज़ल मैं कह रहा हूं, आप ही के नाम पर

इश्क है किसको ख़ुदा से, बस दिलों का ख़ौफ है
नाम की ही बंदगी है, बंदगी के नाम पर

रहनुमा के भेस में, ताजिर भरे हैं इल्म के
जो अंधेरे बेचते हैं, रौशनी के नाम पर

वो नज़ाकत, वो नफ़ासत, अब कहां बाकी रही
बहर ही तो निभ रही है, शायरी के नाम पर

उसने सीखे ही नहीं थे, तौर दुनिया के अभी
लुट गया काफ़िर जहां में, सादगी के नाम पर

जगजीत काफ़िर

तर्क-ए-तअल्लुक = रिश्ता तोड़ना
मशकूर = शुक्रगुज़ार
ताजिर = व्यापारी

چند سانسیں ہی ملی ہیں۔زندگی کے نام پر۔
وہ  بھی  زایہ  ھورہی  ہیں عاشقی کے نام پر۔

اس نے جانا ہی تھا ۔یوں اکیلے مجھے چھوڑ کر
کر گیا ترک تعلق  بے  بسی کے نام پر۔

اس محبت کیلئے  مشکور   ھوں میں آپ کا۔
یہ  غزل    میں   کہ  رھا ھوں ، آپ ہی کے نام پر۔

عشق  ھے   کس  کو  خدا سے ، بس دلوں کا خوف ھے۔
نام  کی  ہی  بندگی  ھے ۔بندگی  کے نام پر۔

راہنما   کے    بھیس   میں
تاجر بھرے  ہیں علم کے۔
جو اندھیرے بیچتے ہیں۔روشنیوں کے نام پر۔

وہ   نزاکت ، وہ   نفاست ، اب  کہاں  باقی  رہی۔
بحر  ہی  نبھ  رہی  ہے۔شاعری کے نام پر۔

اس  نے  سیکھے ہی  نہیں تھے ، تور  دنیا کے ابھی۔
لٹ  گیا  کافر  جہاں  میں،
سادگی  کے نام پر۔

#jagjitkaafir #kaafir

Sunday, September 15, 2019

ग़ज़ल ( और क्या है )

दर्दे-दिल है, शायरी है, और क्या है
अब यही तो ज़िन्दगी है, और क्या है

जो दुखों से हार जाए, टूट जाए
नाम ही का आदमी है, और क्या है

कत्ल होने जा रहा आशिक ये बोला
इक तमाशा आखिरी है, और क्या है

वो अयां है, फिर भी तू महरुम है जो
बस नज़र की तीरगी है, और क्या है

पाक़ इतना और क्या है इस जहां में
मेरी अम्मा की हंसी है, और क्या है

सांस भी ग़र लूं तो उसका नाम आए
इक मुसलसल बंदगी है, और क्या है

हासिल-ए-हस्ती न पूछो काफ़िरों से
इश्क़ है बस इश्क़ ही है, और क्या है

जगजीत काफ़िर

#jagjit_kaafir #kaafir
#jagjitkaafir

Friday, September 6, 2019

ग़ज़ल ( हबीब आकर )

हमारे हाल पे रोते हैं सब हबीब आकर
असीर-ए-ग़म को दवा दे कोई तबीब आकर

मेरी तलाश में कब से भटक रही थी जो
लिपट गई है बदन से मेरे सलीब आकर

खुदा के खौफ की बातें, वो ख़्वाब जन्नत के
सुना रहे हैं फसाने, मुझे ख़तीब आकर

तुम्हारे इश्क ने मुझसे, मुझी को मांगा था
बदन उतार दिया है तेरे करीब आकर

मिटा सका ना ख़ुदी को 'तेरी' तरह 'काफ़िर'
इस एक बात पे रोया मेरा रकीब आकर

जगजीत काफ़िर

असीर-ए-ग़म = prisoner of sorrow
ख़तीब = a preacher, a public speaker or Orator

तबीब = doctor, physician

Wednesday, August 28, 2019

ग़ज़ल (आंख में अश्क)

आंख में अश्क, दहकता हुआ सीना होगा
जब्र यह है कि इसी हाल में जीना होगा

उनसे कह दो कि वो गुफ़्तार का लहजा परखें
बात कहने का भी कोई तो करीना होगा

बज़्म-ए-हस्ती में, सभी जाम उठाने वालो
मौत जब पेश करे जाम तो पीना होगा

जिसकी आंखों के भंवर में है उभरता साहिल 
मेरे अनफ़ास को हासिल, वो सफ़ीना होगा

मेरी वहशत का तकाज़ा है कि अब मौत आए
होश कहता है  दिल-ओ-जान से जीना होगा

कौन आएगा भला मरहमे दिल को काफ़िर
ज़ख़्म-ए-उल्फ़त को यहां आप ही सीना होगा

जगजीत काफ़िर

Friday, August 23, 2019

ग़ज़ल ( हिम्मत किए बिना )

बैठे रहोगे गर यूं ही जुर्रत किए बिना
पाओगे कैसे मंजिलें हिम्मत किए बिना

ये मुफ़लिसी का ढोंग यूं करना फ़िज़ूल है
मिलता नहीं है रिज़्क तो मेहनत किए बिना

हमको क़ुबूल हैं सभी क़िस्मत के फैसले
खानाबदोश हो गए हिजरत किए बिना

आसां नहीं है इश्क यह, दरिया है आग का
कैसे करोगे पार तुम, जुर्रत किए बिना

आशिक भी इन दिनों यही कहता है हुस्न को
मुझको क़रार चाहिए मिन्नत किए बिना

सोचो ख़ुदा को कौन सा चेहरा दिखाएंगे
गर चल दिए ज़मीन को जन्नत किए बिना

दर से किसी फ़कीर के पाओगे किस तरह
दुनिया की सारी नेमतें, खिदमत किए बिना

काफ़िर को गर खुदा मिले सजदे में जा गिरे
होती है उसकी बंदगी जहमत किए बिना

जगजीत काफ़िर

Friday, August 16, 2019

ग़ज़ल ( अब शरारों को मत हवा देना )

अब शरारों को मत हवा देना
दश्त-ए-दिल को न यूं जला देना

तीरगी जो मिटा नहीं सकते
उन चिराग़ों को तुम बुझा देना

मैं फरिश्तों से बात करता हूं
इसके आगे की तुम दुआ देना

मेरी आंखों ने जो नहीं देखा
ख़्वाब ऐसा कोई दिखा देना

लौट आएगा जो भी अपना है
सिर्फ इक बार तुम सदा देना

दाग़ मिटते नहीं मुहब्बत के
वक्त को बात यह बता देना

फ़िक्र तुमको है सारी दुनिया की
मेरे ज़ख्मों की भी दवा देना

हुस्न-ए-जाना के पास बैठे हो
पैकर-ए-दिल को आइना देना

वो जो काफ़िर तुम्हारा आशिक था
हो सके तो उसे भुला देना

जगजीत काफ़िर

Tuesday, August 6, 2019

ग़ज़ल ( न कोई शिकवा नसीब से है )

न कोई शिकवा नसीब से है, न अब खुदा से कोई गिला है
ये कैसी रहमत हुई है मुझ पर, तुम्हारे जैसा सनम मिला है

फलक से उतरा, जुड़ा ज़मीं पर, मेरा तुम्हारा जो सिलसिला है
तुम्हारे पैकर में ढल के मुझको, इबादतों का सिला मिला है

महक रहा है ये सहने-गुलशन, बहार भी है इसी के दम से
रुको ज़रा तुम, अभी न तोड़ो, अभी अभी तो ये गुल खिला है

ये खुदपरस्ती का शौक इक दिन, निज़ाम-ए-दुनिया बिगाड़ देगा
न जाने कैसा ये फलसफा है, हर एक इसमें ही मुब्तिला है

वो अौर होंगे, जो फ़ुरकतों में, आबाद होकर फना हुए हैं
मुझे न पूछो तबाह हुआ तो, मुझे मुहब्बत में क्या मिला है

न जाने कितने बरस लगे हैं, मुझे तुम्हारे करीब आते
मेरे तुम्हारे मिलन में हमदम, बस अब ज़रा सा ही फासिला है

विसाले शब को घिरा रहूं मैं, तुम्हारी जुल्फों की चिलमनों में
इस एक हसरत के पीछे काफिर, तवील रातों का काफिला है

जगजीत काफ़िर

Thursday, November 1, 2018

ग़ज़ल

आसमां का सर झुकाते मेरे ये पर देखिए
आप भी परवाज़ मेरी आज़मा कर देखिए
آسمان کا سر جھکاتے میرے یہ پر دیکھیے
آپ بھی پرواز میری آزما کر دیکھیے
कौन कहता है ज़माने में नहीं सच का निशां
रक्स करता है सलीबों पर ये अक्सर देखिए
کون کہتا ہے زمانے میں نہیں سچ کا نشان
رقص کرتا ہے صلیبوں پر یہ اکثر دیکھیے
इश्क मेरा देख कर था रश्क मुझ से आपको
किस क़दर बर्बाद हूं अब मुझ को आकर देखिए
عشق میرا دیکھ کر تھا رشک مُجھسے آپکو
کس قدر برباد ہوں اب مجھ کو آکر دیکھیے
इश्क आदम औ ख़ुदा ही हर तरफ मामूद है
इस जमीं पर, आसमां पर, जिस जगह पर देखिए
عشق آدم و خدا ہے ہر طرف موڑ ہے
اس زمین پر آسمان پر جس جگہ پر دیکھیے
दर्द की कारीगरी को देखकर हैरान हूं
खुश्क पलकों के तले है अश्क का घर देखिए
درد کی کاریگری کو دیکھ کر حیران ہوں
خشک پلکوں کے تلے ہے عشق کا گھر دیکھیے
गर मुहब्बत में फनां होना वफ़ा की शर्त है
जान हाजिर है सनम इक बार कह कर देखिऐ
گر محبت میں فنا ہونا وفا کی شہرت ہے
جان حاضر ہے صنم ایک بار کہ کر دیکھیے

جگجیت کافر जगजीत काफ़िर

Friday, September 8, 2017

सरमाया

एक दिन उसने पूछा कि क्या है तेरे पास ?
और मैंने कहा :-

इन ठोकरों, इन हिकारतों को,
                     ज़िन्दगी में कमाया है
चन्द शिकवे, चन्द तल्खियों का,
                 तोहफा वक्त भी लाया है

भीगी आस्तीनों पर कुछ अश्क,
              आंखों में मौत का साया है
कुछ ग़म हैं मेरे अपने और,
                   थोड़ा सा दर्द पराया है

कुछ टूटे रिश्तों का रंज़,
                     हिस्से में मेरे आया है
सच कहता हूं थोड़ी सी,
         रूसवाईयों को भी कब्ज़ाया है

अधूरी सी कुछ ख्वाहिशों से,
                   इक आशियां बनाया है
कुछ टूटे बिखरे ख्वाबों से,
                दरो दीवार को सजाया है

कुछ फरेब मिले हैं अपनों से,
             गैरों का सितम भी पाया है
और कुछ अहले जहां का दर्द,
                  दामन में मेरे समाया है

फिलहाल तो ए काफ़िर मेरा,
              बस इतना ही सरमाया है
अभी थोड़े और ज़ख्मों की खातिर,
               मुकद्दर को आज़माया है

हिकारत = नफ़रत काफ़िर 18/07/2002

Sunday, July 17, 2016

सवाल

ये जो मसरूफ है तेरी इबादत में,
हर ज़र्रा कायनात का ।
फिर क्यों है गुजश्ता दोज़ख सी,
ज़िन्दगी इंसान की ?

Sunday, June 12, 2016

बग़ावत

जिस्मों के बाज़ार में जब जरूरत बिकती है,
गर्म सांसो की तपिश से जब रूह पिघलती है,
हवस अपने नकाब से जब बाहर निकलती है,
एक कुचला जिस्म इस निज़ाम का मूंह चिढाता है।
मज़हब के नाम पर जब खून बहता है,
हमसाये से भी कोई दिल ही दिल में डरता है,
इंसान जब वहशत का हमनाम बनता है,
तब शायद कहीं कोई खुदा अश्क बहाता है।
जिन्दगी जब जन्म लेकर बचपन खोती है,
कूड़े में इक निवाले की तलाश होती है,
नंगे बदन हर मौसम की शुरूआत होती है,
अंधी गलियों में हमारा कल मुंह छुपाता है।
बुनियादी ज़रूरतों को जब अवाम तरसता है,
दिलों का ग़ुबार जब आंखो से टपकता है,
इंसान की बेबसी पर जब लहू मचलता है,
काफिर लफ्ज़ों से बग़ावत की बुनियाद बनाता है।

Saturday, June 11, 2016

मैं क्या हूं ?

मैं खुदी में क्या हूं और गफलत में क्या हूं ।
जलवत में क्या हूं और खिलवत में क्या हूं।
चेहरे बहुत हैं हर इक फरद खातिर,
ना जाने कोई के हकीकत में क्या हूं ।
तुम समझते हो के जानते हो मुझे तुम,
नहीं जानते किस फितरत में क्या हूं ।
बरसों हुए ढूंढता हूं खुदी को,
एै काफिर बता किस हालत में क्या हूं ।

Thursday, June 9, 2016

कहानी

कौन समझा है इश्क को काफिर, बड़ी बे-रब्त कहानी है।
इसे अक्ल समझ ना पाएगी, ये दिल की ज़ुबानी है।

Friday, February 19, 2016

मैं रहता हूं

मैं ढूंढता रहता हूं, उन लम्हों को हमदम,
जिन लम्हों में मैं, मैं रहता हूं.
ये दिन गुज़रता है नकाब़ों के साये,
बस रात को ही मैं, मैं रहता हूं.
हर लम्हा ढूंढ रहा हूं खुशियों की बस्ती,
क्या जाने किस तलाश में, मैं रहता हूं.
मुझको नहीं यकीन इस बेबस निज़ाम पे,
इक तलाश-ए-वजूद में, मैं रहता हूं.
जाने वो कर सकूं, दिल में दबी है जो,
ख्वाहिशों के पेच-ओ-ताब में, मैं रहता हूं.
मेरे खुदा मुझे चाहे तो मौत दे दे,
काफिर हूं इस खुदी में भी, मैं रहता हूं.

Friday, April 8, 2011

दिलासा


जो अश्क छिपे है आँखों मे, इक रोज़ इन्हे बह जाने दे,
ना मुझ से छिपा दिल के छाले, जज़्बो॑ को इन्हे सहलाने दे।

जो राज़ छिपे हैँ तेरे दिल में, तेरे गुजश्ता लम्हों के.
होने दे नुमायाँ वो किस्से, जज़्बात की रौ मे बह जाने दे.

रिश्तो॑ की खलिश है जो तुझको, बे-सूद नही पर मिट जायेगी.
बाहों मे सिमट के मेरी तू , खुद को कभी बहलाने दे.

कश्ती-ए-तमन्ना को माना, साहिल न सही मंझधार सही.
थाम के रख ये हाथ सनम, तूफ़ा॑ को ताकत अजमाने दे.

यूं तो दश्त-ए-रस्म-ओ-जहाँ, कोई राह नही दिवानो को.
मंजिल पे पहुंच ही जाये॑गे, खुद क़दमों को राह बनाने दे.

एहतियाज़ है इस काफ़िर के जुनूँ को, तेरी वफ़ा की शिद्दत की.
इब्तिदा-ए-उल्फ़त को हमदम, अन्जाम पे तू पहुँचाने दे.





खलिश= चुभन
नुमायाँ= ज़ाहिर
बे-सूद= बे-वजह
दश्त-ए-रस्म-ओ-जहाँ= दुनिया की रस्मो क ज॑गल
एहतियाज= जरूरत
इब्तिदा= आर॑भ, शुरुआत

Thursday, March 17, 2011

तेरे ख्याल में...


गुज़र गई है ये रात भी, तेरे ख्याल में.
मदहोश था मैं बहका-बहका, तेरे ख्याल में.
मुझको कहा॑ मयस्सर था, मन्ज़र दीदार का.
हासिल हुआ विसाल तेरा, तेरे ख्याल में.
आती हो मेरे पास तो, खाबों मे रोज तुम.
आता हू॑ क्या कभी मैं भी, तेरे ख्याल में ?
हैरत है तुझको रन्ज़ है, हाल-ए-तबाह का.
तू ही बता हयात क्या है, तेरे ख्याल में.
पहले कहा॑ थी शिद्दत इतनी, खिलवत के ख्याल में.
बढती ही जा रही है अब, तेरे ख्याल में.
अलविदा कइ बार बोला, गम गुबार ओर अश्क को.
चले आते हैं फ़िर दोबारा ये, तेरे ख्याल में.
ये काफ़िर जो भूल पाएगा ना, तुझ को तमाम उम्र.
दीवाना सा हो चला है अब, तेरे ख्याल में.


मयस्सर= हासिल
विसाल= मिलन
हयात= ज़िन्दगी, जीवन
खिलवत= तन्हाई

Wednesday, March 16, 2011

याद


हर आहट पे दौड उठते थे दरवाजे की ओर हम,
उनका या उनके खत का हमें इन्तज़ार था.
हमारी तमाम उम्र गयी इन आंखो के रास्ते,
जाने कब नसीब-ए-चश्म मे उनका दीदार था.
हासिल कहां था कदमो को उनकी गली का मोड़,
सुनाते भी किस तरह जो हाल-ए-करार था.
पहरे थे हमारी हस्ती पर निगाह-ए-जहान के,
आना हमारा उन को भी कुछ ना-गवार था.
हमको वहम था कुर्बत का उन की अदाओं से,
ये तबस्सुम तो उनकी आदत में कब से शुमार था.
दिल मे यही थी आरज़ू के मिलते कभी उन्हे,
तफ़्सील से निकलता जो दिल में गुबा़र था.
करते दुआ भी कैसे हम उनके विसाल की,
हम को खुदा पे पहले ही कब ऐतबार था.
तर्क-ए-अज़ार-ए-इश्क की नसीहत किये सभी,
क्या कहिये के इसमे काफ़िर ये बे-इख्तयार था.
चश्म = नज़र
कुर्बत = नज्दीकी
तबस्सुम = मुस्कान
तफ़्सील = विस्तार
विसाल = मिलन
अज़ार= रोग
तर्क = छोडना

रिश्ते


रिश्ते ये रिसते रहते हैं नासूर की तरह,
पडते हैं ये निभाने किसी दस्तूर की तरह.
जाएं भी कैसे तोड़ कर बन्धन निज़ाम के,
इसके आगे हम भी हैं मजबूर बे-तरह.
जीना तो यहा पर पड़ता है हर तन्ज़ को सह कर भी,
जिये जा रहे हैं शिकश्ते-चूर की तरह.
कैसे करें मन्ज़ूर हम अपनी हकीकत ये,
निगाह-ए-अहले जहान मे ना-मन्ज़ूर की तरह.
अपनी भी हस्ति का सितारा था कभी बुलंद,
रह गये हैं होकर हम बे-नूर बे-तरह.
क्यों आये इस आलम में क्या हासिल हस्ति का,
जाते हैं काफ़िर जहान से बद-मकदूर की तरह


निज़ाम = वय्वस्था
बे-तरह = बहुत ज्यादा
तन्ज़ = ताना
बद-मकदूर = बद-नसीब