Friday, May 8, 2020

ग़ज़ल ( ढूंढ रही है )

इक बुत है जिसे मेरी नज़र ढूंढ रही है
मुश्किल है मुलाकात मगर ढूंढ रही है
اک بت ہے جِسے میری نظر ڈھونڈھ رہی ہے
مشکل ہے ملاقات مگر ڈھونڈھ رہی ہے

लाखों में किसी एक के कांधों पे मिलेगा
वो सर कि जिसे अज़मत-ए-सर ढूंढ रही है
لاکھوں میں کِسی ایک کے کاندھوں پے ملےگا
وہ سر کے جِسے عظمتِ سر ڈھونڈھ رہی ہے

मंज़िल ने मेरे पाओं को चूमा है कई बार
मैं वो हूं जिसे गर्द-ए-सफ़र ढूंढ रही है
منزل نے میرے پاؤں کو چوما ہے کئی  بار
میں وہ ہوں ج؟سے گردِ سفر ڈھونڈھ رہی ہے

इक बार करो जंग में उस मां का तसव्वुर
जो फ़ौत हुआ लख़्ते जिगर ढूंढ रही है
اک بار کرو جنگ میں اُس ماں کا تصور
جو فوت ہوا لختِ جگر ڈھونڈھ رہی ہے

परवाज़ को बाक़ी हैं अभी और भी अम्बर 
हसरत मेरी अब ज़र्फ़ के पर ढूंढ रही है
پرواز کو باقی ہیں ابھی اور بھی امبر
حسرت میری اب ظرف کے پر ڈھونڈھ رہی ہے

इक रोज़ उदासी ने मेरा नाम सुना था
उस दिन से मुझे शाम-ओ-सहर ढूंढ रही है
اک روز اُداسی نے میرا نام سُنا  تھا
اس دِن سے مجھے شام و سحر ڈھونڈھ رہی ہے

ख़्वाहिश है बड़ी देर से काफ़िर की जबीं को
सजदे के लिए यार का दर ढूंढ रही है
خواہش ہے بڑی دیر سے کافر کی جبیں کو
سجدے کے لیے یار کا در دوند رہی ہے

जगजीत काफ़िर / جگجیت کافر