Sunday, September 15, 2019

ग़ज़ल ( और क्या है )

दर्दे-दिल है, शायरी है, और क्या है
अब यही तो ज़िन्दगी है, और क्या है

जो दुखों से हार जाए, टूट जाए
नाम ही का आदमी है, और क्या है

कत्ल होने जा रहा आशिक ये बोला
इक तमाशा आखिरी है, और क्या है

वो अयां है, फिर भी तू महरुम है जो
बस नज़र की तीरगी है, और क्या है

पाक़ इतना और क्या है इस जहां में
मेरी अम्मा की हंसी है, और क्या है

सांस भी ग़र लूं तो उसका नाम आए
इक मुसलसल बंदगी है, और क्या है

हासिल-ए-हस्ती न पूछो काफ़िरों से
इश्क़ है बस इश्क़ ही है, और क्या है

जगजीत काफ़िर

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Monday, September 9, 2019

ग़ज़ल ( मैं कहां हूं )

ख्वाब हैं, तदबीर है, ताबीर है, पर मैं कहां हूं
उसके पहलू में मेरी तस्वीर है, पर मैं कहां हूं

मैं वही हूं जो च़राग़ों की तरह जलता रहा था
रोशनी पर हो रही तकरीर है, पर मैं कहां हूं

कत्ल होने की तमन्ना थी दिले-बर्बाद की तब
अब लहू की प्यास में शमशीर है, पर मैं कहां हूं

वो ख़ुदा है, नेमतों का, रहमतों का नाम है वो
हाथ में उसके मेरी तकदीर है, पर मैं कहां हूं

ख्वाब आजादी का मेरी आंख में पलता रहा है
आज टुकड़ों में पड़ी जंजीर है, पर मैं कहां हूं

अब ज़रा संजीदगी से ही क़लम को थामना है
शायरी में, फ़ैज़, गालिब, मीर है, पर मैं कहां हूं

सोचनी है, देखनी है, जिंदगी की चाल काफ़िर
इंकलाब-ए-नौ की इक तामीर है, पर मैं कहां हूं

जगजीत काफ़िर

خواب ہیں، تدبیر ہے، تعبیر ہے، پر میں کہاں ہوں
اس کے پہلو میں مری تصویر ہے، پر میں کہاں ہوں

میں وہی ہوں جو چراغوں کی طرح جلتا رہا
روشنی پر ہو رہی تقریر ہے، پر میں کہاں ہوں

قتل ہونے کی تمنا تھی دلِ برباد کی تب
اب لہو کی پیاس میں شمشیر ہے، پر میں کہاں ہوں

وہ خدا ہے نعمتوں کا،  رحمتوں کا نام ہے وہ
ہاتھ میں اس کے مری تقدیر ہے،  پھر میں کہاں ہوں

خواب آزادی کا میری آنکھ میں پلتا رہا ہے
آج ٹکڑوں میں پڑی زنجیر ہے، پر میں کہاں ہوں

اب زرا سنجیدگی سے ہی قلم کو تھامنا ہے
شاعری میں فیض غالب میر ہے، پر میں کہاں ہوں

سوچنی ہے دیکھنی ہے زندگی کی چال کافر
انقلابِ نو کی اک تعمیر ہے، پر میں کہاں ہوں

-- جگجیت کافر

Friday, September 6, 2019

ग़ज़ल ( हबीब आकर )

हमारे हाल पे रोते हैं सब हबीब आकर
असीर-ए-ग़म को दवा दे कोई तबीब आकर

मेरी तलाश में कब से भटक रही थी जो
लिपट गई है बदन से मेरे सलीब आकर

खुदा के खौफ की बातें, वो ख़्वाब जन्नत के
सुना रहे हैं फसाने, मुझे ख़तीब आकर

तुम्हारे इश्क ने मुझसे, मुझी को मांगा था
बदन उतार दिया है तेरे करीब आकर

मिटा सका ना ख़ुदी को 'तेरी' तरह 'काफ़िर'
इस एक बात पे रोया मेरा रकीब आकर

जगजीत काफ़िर

असीर-ए-ग़म = prisoner of sorrow
ख़तीब = a preacher, a public speaker or Orator

तबीब = doctor, physician