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Friday, April 8, 2011

दिलासा


जो अश्क छिपे है आँखों मे, इक रोज़ इन्हे बह जाने दे,
ना मुझ से छिपा दिल के छाले, जज़्बो॑ को इन्हे सहलाने दे।

जो राज़ छिपे हैँ तेरे दिल में, तेरे गुजश्ता लम्हों के.
होने दे नुमायाँ वो किस्से, जज़्बात की रौ मे बह जाने दे.

रिश्तो॑ की खलिश है जो तुझको, बे-सूद नही पर मिट जायेगी.
बाहों मे सिमट के मेरी तू , खुद को कभी बहलाने दे.

कश्ती-ए-तमन्ना को माना, साहिल न सही मंझधार सही.
थाम के रख ये हाथ सनम, तूफ़ा॑ को ताकत अजमाने दे.

यूं तो दश्त-ए-रस्म-ओ-जहाँ, कोई राह नही दिवानो को.
मंजिल पे पहुंच ही जाये॑गे, खुद क़दमों को राह बनाने दे.

एहतियाज़ है इस काफ़िर के जुनूँ को, तेरी वफ़ा की शिद्दत की.
इब्तिदा-ए-उल्फ़त को हमदम, अन्जाम पे तू पहुँचाने दे.





खलिश= चुभन
नुमायाँ= ज़ाहिर
बे-सूद= बे-वजह
दश्त-ए-रस्म-ओ-जहाँ= दुनिया की रस्मो क ज॑गल
एहतियाज= जरूरत
इब्तिदा= आर॑भ, शुरुआत

Thursday, February 17, 2011

हकीकत


अपने मुकद्दर की फ़ितरत से वाकिफ़ हूं मैं,
अपनी गुऱबत का भी मुझ को  अहसास है.
महज़ चन्द कतरे हैं हासिल मेरे लबों को,
और समन्दर की दिल मे दबी प्यास है.
सोचने का सबब हैं , ये कुर्बतें भी,
चन्द ही रोज़ की तो रफ़ाकत है तुमसे.
अपने लगते हो जब के हो गैर भी,
किस बिना पर कहूं के मोहब्बत है तुमसे.
मै हिरासां हूं ना टूट जाएं कहीं,
इन दिनो खाब जो तुम दिखाती हो मुझको.
तेरी आदत ही ना हो ये तेरा तब्बसुम,
बे-वजह तुम खिलोना बनाती हो मुझको.
पेश्कदमी से पहले ज़रा सोच लो तुम,
क्या अपने अहद को निभा भी सकोगी?
मेरे हमराज़ हैं मेरे माज़ी के साये,
इन अन्धेरों से खुद को बचा भी सकोगी ?