Showing posts with label ishk. Show all posts
Showing posts with label ishk. Show all posts

Wednesday, April 3, 2019

ग़ज़ल

राहे अमल पे निकले जो पुर यकीन होकर
सजदे में आ गिरेगा अम्बर, ज़मीन होकर

जिसको सलीब पर भी आता है रक्स करना
वो कब फनां हुआ है गोशानशीन होकर

जो दिलजला कज़ा का दामन पकड़ के गुज़रा
उसको हयात लिपटी है बहतरीन होकर

उसका ख्याल बनकर मुझमें समा गई है
सारे जहां की वुसअत सबसे महीन होकर

ये इश्क है उसी का, उसको ही सौंप दो अब
ये फ़र्ज़ है निभाना तुमको अमीन होकर

कुछ तो कमाल करते, दीवानगी कमाते
पाया ही क्या है तुमने, इतना ज़हीन होकर

हर ऐब को मिटाकर, खुद को निखारना है
काफ़िर चलो दिखाएं आला तरीन होकर

जगजीत काफ़िर

रक्स = नृत्य
गोशानशीन = एकांतवासी
वुसअत = विशालता
अमीन = अमानतदार