Tuesday, October 22, 2019

ग़ज़ल ( डूबती मौजों में कश्ती जैसे साहिल पर मिले )

डूबती मौजों में कश्ती जैसे साहिल पर मिले 
सिलसिला हर बार दिल का दर्द से जाकर मिले

टूट कर आगोश में वो हमसे यूं आकर मिले 
खोल कर बाहें नदी को जिस तरह सागर मिले

ऐ ज़माने हक़ बयानी कब तुम्हें मंज़ूर थी 
हर मसीहा को तुम्हारे हाथ में पत्थर मिले

इस जहां में क्या शबाहत हो मेरे महबूब की
चांद तारे, फूल सब उस हुस्न से कमतर मिले

और चमकेगी यकीनन, दौर-ए-हाज़िर में ग़ज़ल
इल्म के सब तालिबों को गर कोई रहबर मिले

इश्क़ में काफ़िर को हासिल हो फना कुछ इस तरह
जिस तरह कुकनुस को जलकर इक नया पैकर मिले

जगजीत काफ़िर

शबाहत = एकरुपता, हमशक्ली
कुकनुस = एक पौराणिक पक्षी जो अपनी राख से पुनर्जीवित हो जाता है

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