ये जो मसरूफ है तेरी इबादत में,
हर ज़र्रा कायनात का ।
फिर क्यों है गुजश्ता दोज़ख सी,
ज़िन्दगी इंसान की ?
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Sunday, July 17, 2016
सवाल
Saturday, June 11, 2016
मैं क्या हूं ?
मैं खुदी में क्या हूं और गफलत में क्या हूं ।
जलवत में क्या हूं और खिलवत में क्या हूं।
चेहरे बहुत हैं हर इक फरद खातिर,
ना जाने कोई के हकीकत में क्या हूं ।
तुम समझते हो के जानते हो मुझे तुम,
नहीं जानते किस फितरत में क्या हूं ।
बरसों हुए ढूंढता हूं खुदी को,
एै काफिर बता किस हालत में क्या हूं ।
Friday, April 8, 2011
दिलासा
जो अश्क छिपे है आँखों मे, इक रोज़ इन्हे बह जाने दे,
ना मुझ से छिपा दिल के छाले, जज़्बो॑ को इन्हे सहलाने दे।
जो राज़ छिपे हैँ तेरे दिल में, तेरे गुजश्ता लम्हों के.
होने दे नुमायाँ वो किस्से, जज़्बात की रौ मे बह जाने दे.
रिश्तो॑ की खलिश है जो तुझको, बे-सूद नही पर मिट जायेगी.
बाहों मे सिमट के मेरी तू , खुद को कभी बहलाने दे.
कश्ती-ए-तमन्ना को माना, साहिल न सही मंझधार सही.
थाम के रख ये हाथ सनम, तूफ़ा॑ को ताकत अजमाने दे.
यूं तो दश्त-ए-रस्म-ओ-जहाँ, कोई राह नही दिवानो को.
मंजिल पे पहुंच ही जाये॑गे, खुद क़दमों को राह बनाने दे.
एहतियाज़ है इस काफ़िर के जुनूँ को, तेरी वफ़ा की शिद्दत की.
इब्तिदा-ए-उल्फ़त को हमदम, अन्जाम पे तू पहुँचाने दे.
खलिश= चुभन
नुमायाँ= ज़ाहिर
बे-सूद= बे-वजह
दश्त-ए-रस्म-ओ-जहाँ= दुनिया की रस्मो क ज॑गल
एहतियाज= जरूरत
इब्तिदा= आर॑भ, शुरुआत
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