Thursday, March 24, 2011

मुझको भुला दो !


ना तडपो मेरे गम मे, शाम-ओ-सहर तुम.
मेरे नक्श अपने दिल से मिटा दो !
ना आ॑सू बहाओ मेरी याद मे अब,
बेहतर यही है के मुझको भुला दो !
एक मुफ़लिस को मोहब्बत जताने से पहले,
अन्जाम-ए-मोहब्बत को सोचा तो होता.
अब जो शिकश्ता हो अपने अहद से,
हर अहद से रिहाई मुझे भी दिला दो.
बेहतर यही है के मुझको भुला दो !
महज़ खाब हू मै ओर कुछ भी नही मै,
हकीकत मुझे तुम बना ना सकोगे.
उम्र कैसे कटेगी किसि खाब के स॑ग,
इस खाब को अब नज़र से गिरा दो.
बेहतर यही है के मुझको भुला दो !
देखो जरा अपनी नज़रे उठा कर,
ये बहारे ये कलिया॑ तुम्हारे लिये है.
ना ठुकराओ इनको मेरी वजह से,
न तर्क-ए-मोहब्बत की खुद को सजा दो.
बेहतर यही है के मुझको भुला दो !


मुफ़लिस=गरीब
शिकश्ता=हारा हुआ
अहद=वचन वादा
तर्क कर्ना=छोडना

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