दिल मे यही तमन्ना थी, खत कोई मुझे भि लिखती तुम.
मेरी तरह कभी मुझ से भी, दिल कि दिल से कहती तुम.
हसरत थी मुझको पढने कि, तेरी ज़ीस्त के पन्नो को.
अपने हि लफ़्ज़ो मे ढलकर, मेरी आ॑खो मे खुलती तुम.
आये है सुनते सदियो से, अफ़साने हज़ारो मोहब्बत के.
ऐसी हि किसि दिवानी सि, कभी आकर मुझसे मिलती तुम.
कुछ नक्श बनाए थे मैने, बादल के टुकडो के ऊपर.
कभी आकर र॑ग हकीकत के, उस तस्वीर मे भरती तुम.
नुमाया॑ थी मन्ज़िल कि सूरत, रोशन थी राहे उल्फ़त की.
खुल जाते दरीचे किस्मत के, दो कदम जो साथ मे चलती तुम.
अक्सर हि पशेमा॑ होती है, कुरबत कि तस्वीर यहा॑.
तन्हाई कि इस शिदद्त को, मेरी तरह कभी सहती तुम.
ओर तमन्ना थी इक मेरी, के तेरी तमन्न ये होती.
काफ़िर के इस कालिब मे, रूह कि ज़ानिब रहती तुम.
ज़ीस्त= जिन्दगी
नुमाया॑= प्रकट, सामने
दरीचे= दरवाजे
पशेमा॑= शर्मिन्दा
कुरबत= नजदीकिया
कालिब=जिस्म, शरीर
ज़ानिब= तरह, जैसे
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