Thursday, March 17, 2011

आखिर कैसे


कोइ बताए आखिर कैसे, उनसे हम इज़हार करे.
अपनी नादान मोहब्बत का, कैसे उनसे इकरार करे.
देते है सदाऎ नज़रो से, खामोशि मे सब कहते है.
हिज़ाब की ऐसी मूरत से , अब कैसे हम इसरार करे.
एक ही लम्हे मे जाने वो, कितने र‌॑ग बदलते है.
उस तस्वीर-ए-कयामत के किस र॑ग का हम ऎतबार करे.
कुछ फ़िक्र है उनको दुनिया की, कुछ अपने आप से डरते है.
वो नज़र बचाना चाहते है, हम चाहते है दीदार करे.
हमारे खाबो के गुलिस्ता मे, उनके कदमो कि राह-गुज़र है.
किसि रोज हकीकत बन कर वो, इस वीराने को गुल्ज़ार करे॑.
जिन जज़्बो से आशना है वो, ह॑सते भि है उन्ही पर.
अब ऐसे सितमगर से ऐ काफ़िर, कैसे ना हम प्यार करे.



सदा= पुकार
इसरार=अनुरोध
हिज़ाब=शर्म
आशना=परिचित

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