इस तरह हाथ छुडा के तू, कैसे अलग हो सकता है.
साथिया मत छोड के जा, जब लौट के तुझको आना है.
उम्र कि इन लम्बी राहो॑ पर, कैसे चल पाये॑गे तन्हा.
आखिर तो हम दोनो को, इक दूजे का साथ निभाना है.
कैसे गुजर हो सकती है, अम्बर की बाहो॑ मे रहकर.
जो सपने है इन आ॑खो मे, धरती पर उनको लाना है.
मकानो के इस ज॑गल से, पत्थर के लोगो से दूर.
हमको भी इक छोटा सा, खुद का घर बसाना है.
मै रूप हू॑ जैसे बादल का, मिट्टी है तू ममता की.
अपने आ॑गन की बगिया मे, उलफ़त के फ़ूल खिलाना है.
ये क्या के इक दूजे से हम, नाराज़ अभी से हो बैठे.
अभी तो ऐ हमदम हमको, दूर सफ़र पे जाना है.
आ जओ इन बाहो॑ मे, के इन्तजार तुम्हारा अब भी है.
आखिर अपने दीवाने पर, और कितना सितम कमाना है.
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