क्या तुझसे कहू॑ मैं काफ़िर, क्यों चश्म-ए-आब है.
बे-तरह वलवलो॑ का दिल में सैलाब है.
कैसे करू॑ बयान मैं अपनी जुबान से,
कोई बात ता-ब-लब और दश्त-ए-शराब है.
दहशत है मेरी आ॑ख में पर्वाने की मौत से.
बे-रब्त है॑ ख्याल, दिल-ए-इज़्तिराब है.
ज़ाहिरा थे इस जहान मे तेग-ए-बकफ़ सभी.
तबाही का मेरी बायस, इक बुत-ए-शबाब है.
उलझा था एक बार फ़िर आया ना लौट के.
अल्लाह कैसा ज़ुल्फ़ का ये पेच-ओ-ताब है.
शोहरत है मेरे नाम की सारे जहान में.
कहते हैं मुझको देख कर वही खाना-खराब है.
करिये भी क्या गुरूर इस जिस्म-ए-हकीर का.
मेरी हस्ती की भी हकीकत बस मिस्ल-ए-हुबाब है.
जगजीत सिंह काफिर
चश्म-ए-आब = गीली आ॑ख
ता-ब-लब = होठो॑ पर
रब्त = बे-तरतीब
इज़्तिराब = व्याकुल
ज़ाहिरा = प्रकट मे
तेग-ए-बकफ़ = तलवार हाथ मे लिये
मर्कज़ = केन्द्र
बुत-ए-शबाब = खूबसूरत हसीना
पेच-ओ-ताब = उल्झन
हकीर = तुच्छ
मिस्ल-ए-हुबाब = बुलबुले की तरह
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