जाने क्यों खामोश इतनी ये रात है।
बे-तरह आंसुओं की क्यों बरसात है।
मेरे आग़ोश में बस तू ही नहीं,
कहने को तो सारी कायनात है।
पेश है तू मुझसे, किसी ग़ैर की तरह,
इक अजीब आखिरी सी ये मुलाकात है।
तेरी बेरूखी की मैं वजह पूछता हूं,
कहते हो तुम कि ये बे-बात है।
तेरा हर सितम है कुबूल हमनशीं,
तेरे सामने मेरी क्या बिसात है।
लरज़ते हैं होंठ, कुछ कहते भी नहीं,
तेरे ता-ब-लब , कुछ ऐसी बात है।
गीली सिसकीयां कोइ और सुन ना ले,
रोने में भी कैसी ये एहतियात है।
लौट भी गये तुम, कहकर सब निगाह से,
काफिर ये कैसी इश्क की वारदात है।
बे-तरह = बुरी तरह से
कायनात = दुनिया
ता-ब-लब = होठों पर
एहतियात = सावधानी
लरज़ते = कांपते
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