नज़र
तस्कीन-ए-नज़र के वास्ते,
बस इक नज़र की बात है।
नज़रों में जिससे रअनाई,
और जो झुके तो रात है।
हर इक नज़र, नज़र उसको,
हम जिस नज़र के मुन्तिज़र हैं।
उस एक नज़र के सामने,
किस नज़र की कैसी बिसात है।
गर ना नज़र, नज़र आए वो,
हमारी नज़र को सौ उलझनें हैं।
बरसों हुए उस गहरी नज़र में,
गुमगश्ता हमारी हयात है।
या खुदा कहीं उस शोख़ नज़र को,
नज़र ना कोई लग जाए।
नज़र नज़र के अफ़सानों मे,
हर नज़र से फरेब-ए-सबात है।
J S Kaafir
2/6/2005
तस्कीन = तसल्ली
रअनाई = रौशनी
मुन्तिज़र = in waiting ईंतजार मे
गुमगश्ता = खोई हुई
सबात = एकनिश्ठता, स्थिरता
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