Friday, May 6, 2016

ज़िंदगी

ज़िंदगी हिसाब का सवाल है, कुछ और नहीं ।
इक जानलेवा बवाल है, कुछ और नहीं ।
साल तो बढते हैं, और उम्र घटती जाती है ।
वक्त के ज़र्ब का कमाल है, कुछ और नहीं ।
ये सोचना बशर का, मुकम्मल इसको जान लूं।
सिर्फ ख्याल ही ख्याल है, कुछ और नहीं ।
हर एक शख्स जो, हंसता नज़र आता है,
एक सुलगता सा निहाल है, कुछ और नहीं ।
ये रिश्ते, ये जज़्बे, ये रूतबे, ये निज़ाम,
इंसानी फितरत के जाल हैं, कुछ और नहीं ।
हर चीज़ है मयस्सर, इंसान को जहां में,
बस मौत ही मुहाल है, कुछ और नहीं ।
खुद को खिज़्र ना समझ ऐ काफिर तू,
फनां के तह-ए-बाल है, कुछ और नहीं ।

बवाल = मुसीबत
बशर = इंसान
निहाल = पेड़
मयस्सर = हासिल
मुहाल = मुश्किल
खिज़्र = एक अवतार जो अमर हैं
फनां = मौत
तह-ए-बाल = कैद में
निज़ाम = व्यवस्था

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