Friday, August 16, 2019

ग़ज़ल ( अब शरारों को मत हवा देना )

अब शरारों को मत हवा देना
दश्त-ए-दिल को न यूं जला देना

तीरगी जो मिटा नहीं सकते
उन चिराग़ों को तुम बुझा देना

मैं फरिश्तों से बात करता हूं
इसके आगे की तुम दुआ देना

मेरी आंखों ने जो नहीं देखा
ख़्वाब ऐसा कोई दिखा देना

लौट आएगा जो भी अपना है
सिर्फ इक बार तुम सदा देना

दाग़ मिटते नहीं मुहब्बत के
वक्त को बात यह बता देना

फ़िक्र तुमको है सारी दुनिया की
मेरे ज़ख्मों की भी दवा देना

हुस्न-ए-जाना के पास बैठे हो
पैकर-ए-दिल को आइना देना

वो जो काफ़िर तुम्हारा आशिक था
हो सके तो उसे भुला देना

जगजीत काफ़िर

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