Sunday, September 15, 2019

ग़ज़ल ( और क्या है )

दर्दे-दिल है, शायरी है, और क्या है
अब यही तो ज़िन्दगी है, और क्या है

जो दुखों से हार जाए, टूट जाए
नाम ही का आदमी है, और क्या है

कत्ल होने जा रहा आशिक ये बोला
इक तमाशा आखिरी है, और क्या है

वो अयां है, फिर भी तू महरुम है जो
बस नज़र की तीरगी है, और क्या है

पाक़ इतना और क्या है इस जहां में
मेरी अम्मा की हंसी है, और क्या है

सांस भी ग़र लूं तो उसका नाम आए
इक मुसलसल बंदगी है, और क्या है

हासिल-ए-हस्ती न पूछो काफ़िरों से
इश्क़ है बस इश्क़ ही है, और क्या है

जगजीत काफ़िर

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