Wednesday, April 7, 2021

ग़ज़ल ( ज़मीनों में )

नहीं मिलना है कुछ इन फ़िक्र की बंजर ज़मीनों में
चलो अहसास को ढूंढें ज़रा दिल के दफ़ीनों में
نہیں ملنا ہے کچھ ان فکر کی بنجر زمینوں میں
چلو احساس کو ڈھونڈھیں ذرا دل کے دفینوں میں

तड़पना भूल बैठी हैं सनमख़ाने की दीवारें
नहीं अब संग-ए-दर को फोड़ने का दम जबीनों में
تڑپنا بھول بیٹھی ہیں سنمخانے کی دیواریں
نہیں اب سنگ در کو پھوڑنے کا دم جبینوں میں

हमारी खाल तक झुलसी हुई है इनकी सोहबत से
छुपा रक्खे हैं इतने सांप हमने आस्तीनों में
ہماری کھال تک جھلسی ہوئی ہے انکی صحبت سے
چھپا رکھے ہیں اتنے سانپ ہم نے آستینوں میں

ये कब्रिस्तान सारे यादगार-ए-इश्क ही तो हैं
कई आशिक यहां पर दफ़्न हैं कब्रों के सीनों में
یہ قبرستان سارے یادگار عشق ہی تو ہیں
کئی عاشق یہاں پر دفن ہیں قبروں کے سینوں میں

अगर बंदों में है तफरीक़ तो हैरान क्यों हो तुम
यहां तफरीक़ है खुतबों, ख़ुदाओं और दीनों में
اگر بندوں میں ہے تفریق تو حیران کیوں ہو تم
یہاں تفریق ہے کھتبوں، خداؤں اور دینوں میں

मेरा भी सब्र टूटे, ज़ब्त छूटे, जलजला आए
अभी तक क़ैद हैं सब अश्क मेरे आबगीनों में
میرا بھی صبر ٹوٹے، ضبط چھوٹے، جلجلا آئے
ابھی تک قید ہیں سب اشک میرے آبگینوں میں

तेरे अल्फाज़ क्या लहजे को भी मालूम हो काफ़िर
"अदब पहला करीना है मुहब्बत के करीनों में"
تیرے الپھاز کیا لہجے کو بھی معلوم ہو کافر
"ادب پہلا قرینہ ہے محبت کے قرینوں میں"

जगजीत काफ़िर جگجیت کافر

दफ़ीनों = छुपे हुए ख़ज़ाने, गहरे दबे हुए
आबगीनों = बारीक़ परत वाली काँच की बोतलें
क़रीना = शिष्टता, तमीज़, सलीका

No comments:

Post a Comment