Wednesday, March 9, 2011

आखिर क्यो ?


हर बार सिर्फ़ तू बनता है, क्यो कुदरत का मज़ाक काफ़िर.
मोहब्बत कि राह पे बनता है क्यो नफ़रत का हकदार आखिर.
हर बार तेरे हिस्से मे आखिर ये गम क्यो है.
तेरि उदासी का बायस तेरा हि हमदम क्यो है.
जिसे तू चाहे तेरे सिने पे क्यो नश्तर वो हि चलाता है.
अश्को से ज़ख्मो को सीना क्यो तुझको नहि आता है.
क्य ये तेरा नसीब है अपनो से रुसवा होना.
जो भि दिल के करीब हो उसी का दिल से ज़ुदा होना.
खफ़ा खफ़ा सा मुझसे क्यो तेरा रुख-ए-मह्ताब है.
सोज़-ए-दिल कि इन आन्खो से तमन्ना-ए-चन्द-सवालात है.
ना वो समझ पाये ना पायेगे, जो भि मेरे जज़्बात है.
दुश्मन खुदा है या मह्बूब जो ये मेरे हालात है?

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