जिस्मों के बाज़ार में जब जरूरत बिकती है,
गर्म सांसो की तपिश से जब रूह पिघलती है,
हवस अपने नकाब से जब बाहर निकलती है,
एक कुचला जिस्म इस निज़ाम का मूंह चिढाता है।
मज़हब के नाम पर जब खून बहता है,
हमसाये से भी कोई दिल ही दिल में डरता है,
इंसान जब वहशत का हमनाम बनता है,
तब शायद कहीं कोई खुदा अश्क बहाता है।
जिन्दगी जब जन्म लेकर बचपन खोती है,
कूड़े में इक निवाले की तलाश होती है,
नंगे बदन हर मौसम की शुरूआत होती है,
अंधी गलियों में हमारा कल मुंह छुपाता है।
बुनियादी ज़रूरतों को जब अवाम तरसता है,
दिलों का ग़ुबार जब आंखो से टपकता है,
इंसान की बेबसी पर जब लहू मचलता है,
काफिर लफ्ज़ों से बग़ावत की बुनियाद बनाता है।
Sunday, June 12, 2016
बग़ावत
Saturday, June 11, 2016
मैं क्या हूं ?
मैं खुदी में क्या हूं और गफलत में क्या हूं ।
जलवत में क्या हूं और खिलवत में क्या हूं।
चेहरे बहुत हैं हर इक फरद खातिर,
ना जाने कोई के हकीकत में क्या हूं ।
तुम समझते हो के जानते हो मुझे तुम,
नहीं जानते किस फितरत में क्या हूं ।
बरसों हुए ढूंढता हूं खुदी को,
एै काफिर बता किस हालत में क्या हूं ।
Thursday, June 9, 2016
Sunday, May 15, 2016
Friday, May 6, 2016
ज़िंदगी
ज़िंदगी हिसाब का सवाल है, कुछ और नहीं ।
इक जानलेवा बवाल है, कुछ और नहीं ।
साल तो बढते हैं, और उम्र घटती जाती है ।
वक्त के ज़र्ब का कमाल है, कुछ और नहीं ।
ये सोचना बशर का, मुकम्मल इसको जान लूं।
सिर्फ ख्याल ही ख्याल है, कुछ और नहीं ।
हर एक शख्स जो, हंसता नज़र आता है,
एक सुलगता सा निहाल है, कुछ और नहीं ।
ये रिश्ते, ये जज़्बे, ये रूतबे, ये निज़ाम,
इंसानी फितरत के जाल हैं, कुछ और नहीं ।
हर चीज़ है मयस्सर, इंसान को जहां में,
बस मौत ही मुहाल है, कुछ और नहीं ।
खुद को खिज़्र ना समझ ऐ काफिर तू,
फनां के तह-ए-बाल है, कुछ और नहीं ।
बवाल = मुसीबत
बशर = इंसान
निहाल = पेड़
मयस्सर = हासिल
मुहाल = मुश्किल
खिज़्र = एक अवतार जो अमर हैं
फनां = मौत
तह-ए-बाल = कैद में
निज़ाम = व्यवस्था
Friday, February 19, 2016
मैं रहता हूं
मैं ढूंढता रहता हूं, उन लम्हों को हमदम,
जिन लम्हों में मैं, मैं रहता हूं.
ये दिन गुज़रता है नकाब़ों के साये,
बस रात को ही मैं, मैं रहता हूं.
हर लम्हा ढूंढ रहा हूं खुशियों की बस्ती,
क्या जाने किस तलाश में, मैं रहता हूं.
मुझको नहीं यकीन इस बेबस निज़ाम पे,
इक तलाश-ए-वजूद में, मैं रहता हूं.
जाने वो कर सकूं, दिल में दबी है जो,
ख्वाहिशों के पेच-ओ-ताब में, मैं रहता हूं.
मेरे खुदा मुझे चाहे तो मौत दे दे,
काफिर हूं इस खुदी में भी, मैं रहता हूं.
Wednesday, December 16, 2015
Friday, October 16, 2015
Monday, August 31, 2015
एक मुलाकात
जाने क्यों खामोश इतनी ये रात है।
बे-तरह आंसुओं की क्यों बरसात है।
मेरे आग़ोश में बस तू ही नहीं,
कहने को तो सारी कायनात है।
पेश है तू मुझसे, किसी ग़ैर की तरह,
इक अजीब आखिरी सी ये मुलाकात है।
तेरी बेरूखी की मैं वजह पूछता हूं,
कहते हो तुम कि ये बे-बात है।
तेरा हर सितम है कुबूल हमनशीं,
तेरे सामने मेरी क्या बिसात है।
लरज़ते हैं होंठ, कुछ कहते भी नहीं,
तेरे ता-ब-लब , कुछ ऐसी बात है।
गीली सिसकीयां कोइ और सुन ना ले,
रोने में भी कैसी ये एहतियात है।
लौट भी गये तुम, कहकर सब निगाह से,
काफिर ये कैसी इश्क की वारदात है।
बे-तरह = बुरी तरह से
कायनात = दुनिया
ता-ब-लब = होठों पर
एहतियात = सावधानी
लरज़ते = कांपते
Sunday, August 30, 2015
शौक-ए-सुखन
ये मेरा शौक-ए-सुखन
और तू गाफिल-इश्क,
क्या जाने कलम में हरकत ये
बे-वजह नहीं आती।
आती हैं यूं तो शोखियां ,
हर इक दौर-ए-बुतां लेकिन,
कोई खुद को खुदा समझे,
इस तरह नहीं आती।
ये तो हम हैं कि बर्बाद
सब कुछ आप कर बैठे,
उस पर बेरूखी तेरी,
नज़र ये सह नहीं पाती।
यूं तो तेरी आंखे हैं
तेरे दिल का आईना,
मगर कोई बात है हमसे
जिसे तू कह नहीं पाती।
मेरी मफलूक हस्ती को
कहां हासिल तेरा दामन,
मेरी शब-ए-नसीबां में
तेरी सुबह नहीं आती।
दिल में इक आग है और आंख में हैं
अश्क काफिर के,
दिखाएं खुद का रुख-ए-खुश,
अदा बस यह नहीं आती।
Wednesday, August 26, 2015
नज़र
नज़र
तस्कीन-ए-नज़र के वास्ते,
बस इक नज़र की बात है।
नज़रों में जिससे रअनाई,
और जो झुके तो रात है।
हर इक नज़र, नज़र उसको,
हम जिस नज़र के मुन्तिज़र हैं।
उस एक नज़र के सामने,
किस नज़र की कैसी बिसात है।
गर ना नज़र, नज़र आए वो,
हमारी नज़र को सौ उलझनें हैं।
बरसों हुए उस गहरी नज़र में,
गुमगश्ता हमारी हयात है।
या खुदा कहीं उस शोख़ नज़र को,
नज़र ना कोई लग जाए।
नज़र नज़र के अफ़सानों मे,
हर नज़र से फरेब-ए-सबात है।
J S Kaafir
2/6/2005
तस्कीन = तसल्ली
रअनाई = रौशनी
मुन्तिज़र = in waiting ईंतजार मे
गुमगश्ता = खोई हुई
सबात = एकनिश्ठता, स्थिरता
Tuesday, August 25, 2015
मेरे हमसफर
Dedicated to my loving wife
मेरे हमसफर
उम्र की इस राहगुज़र पे,
इक लम्बा वक्त बिताया हमने।
पाओं के सिसकते छालों को,
अश्कों से सहलाया हमने।
तेरी मेरी आंखो में,
साये थे चन्द सवालों के।
उम्मीद के चन्द खिलौनों से,
इक दूजे को बहलाया हमने ।
कुछ ख्वाब पकड़ के मुट्ठी में,
अंबर की ओर उछाले हमने ।
कुछ दूर खला में जा पहुंचे,
कुछ को कामिल पाया हमने ।
वो दौर के जब तन्हा थे हम,
रिश्तों के इस जंगल में।
आग़ोश में इक दूजे के खुद को,
महफूज़ सलामत पाया हमने ।
बस यूं ही देना साथ मेरा,
मेरे आखिरी लम्हे तक हमदम।
जायें तो ये शुक्र करें,
कि तुम्हे खुदा से पाया हमने ।
J S Kaafir
4/8/2015
Friday, July 8, 2011
दिल-ए-इज़्तिराब
क्या तुझसे कहू॑ मैं काफ़िर, क्यों चश्म-ए-आब है.
बे-तरह वलवलो॑ का दिल में सैलाब है.
कैसे करू॑ बयान मैं अपनी जुबान से,
कोई बात ता-ब-लब और दश्त-ए-शराब है.
दहशत है मेरी आ॑ख में पर्वाने की मौत से.
बे-रब्त है॑ ख्याल, दिल-ए-इज़्तिराब है.
ज़ाहिरा थे इस जहान मे तेग-ए-बकफ़ सभी.
तबाही का मेरी बायस, इक बुत-ए-शबाब है.
उलझा था एक बार फ़िर आया ना लौट के.
अल्लाह कैसा ज़ुल्फ़ का ये पेच-ओ-ताब है.
शोहरत है मेरे नाम की सारे जहान में.
कहते हैं मुझको देख कर वही खाना-खराब है.
करिये भी क्या गुरूर इस जिस्म-ए-हकीर का.
मेरी हस्ती की भी हकीकत बस मिस्ल-ए-हुबाब है.
जगजीत सिंह काफिर
चश्म-ए-आब = गीली आ॑ख
ता-ब-लब = होठो॑ पर
रब्त = बे-तरतीब
इज़्तिराब = व्याकुल
ज़ाहिरा = प्रकट मे
तेग-ए-बकफ़ = तलवार हाथ मे लिये
मर्कज़ = केन्द्र
बुत-ए-शबाब = खूबसूरत हसीना
पेच-ओ-ताब = उल्झन
हकीर = तुच्छ
मिस्ल-ए-हुबाब = बुलबुले की तरह