यूं ना लफ्ज़ों से जज़्बात कुरेदो
दोस्तो मैं आज सोना चाहता हूं ।
Wednesday, December 16, 2015
Friday, October 16, 2015
Monday, August 31, 2015
एक मुलाकात
जाने क्यों खामोश इतनी ये रात है।
बे-तरह आंसुओं की क्यों बरसात है।
मेरे आग़ोश में बस तू ही नहीं,
कहने को तो सारी कायनात है।
पेश है तू मुझसे, किसी ग़ैर की तरह,
इक अजीब आखिरी सी ये मुलाकात है।
तेरी बेरूखी की मैं वजह पूछता हूं,
कहते हो तुम कि ये बे-बात है।
तेरा हर सितम है कुबूल हमनशीं,
तेरे सामने मेरी क्या बिसात है।
लरज़ते हैं होंठ, कुछ कहते भी नहीं,
तेरे ता-ब-लब , कुछ ऐसी बात है।
गीली सिसकीयां कोइ और सुन ना ले,
रोने में भी कैसी ये एहतियात है।
लौट भी गये तुम, कहकर सब निगाह से,
काफिर ये कैसी इश्क की वारदात है।
बे-तरह = बुरी तरह से
कायनात = दुनिया
ता-ब-लब = होठों पर
एहतियात = सावधानी
लरज़ते = कांपते
Sunday, August 30, 2015
शौक-ए-सुखन
ये मेरा शौक-ए-सुखन
और तू गाफिल-इश्क,
क्या जाने कलम में हरकत ये
बे-वजह नहीं आती।
आती हैं यूं तो शोखियां ,
हर इक दौर-ए-बुतां लेकिन,
कोई खुद को खुदा समझे,
इस तरह नहीं आती।
ये तो हम हैं कि बर्बाद
सब कुछ आप कर बैठे,
उस पर बेरूखी तेरी,
नज़र ये सह नहीं पाती।
यूं तो तेरी आंखे हैं
तेरे दिल का आईना,
मगर कोई बात है हमसे
जिसे तू कह नहीं पाती।
मेरी मफलूक हस्ती को
कहां हासिल तेरा दामन,
मेरी शब-ए-नसीबां में
तेरी सुबह नहीं आती।
दिल में इक आग है और आंख में हैं
अश्क काफिर के,
दिखाएं खुद का रुख-ए-खुश,
अदा बस यह नहीं आती।
Wednesday, August 26, 2015
नज़र
नज़र
तस्कीन-ए-नज़र के वास्ते,
बस इक नज़र की बात है।
नज़रों में जिससे रअनाई,
और जो झुके तो रात है।
हर इक नज़र, नज़र उसको,
हम जिस नज़र के मुन्तिज़र हैं।
उस एक नज़र के सामने,
किस नज़र की कैसी बिसात है।
गर ना नज़र, नज़र आए वो,
हमारी नज़र को सौ उलझनें हैं।
बरसों हुए उस गहरी नज़र में,
गुमगश्ता हमारी हयात है।
या खुदा कहीं उस शोख़ नज़र को,
नज़र ना कोई लग जाए।
नज़र नज़र के अफ़सानों मे,
हर नज़र से फरेब-ए-सबात है।
J S Kaafir
2/6/2005
तस्कीन = तसल्ली
रअनाई = रौशनी
मुन्तिज़र = in waiting ईंतजार मे
गुमगश्ता = खोई हुई
सबात = एकनिश्ठता, स्थिरता
Tuesday, August 25, 2015
मेरे हमसफर
Dedicated to my loving wife
मेरे हमसफर
उम्र की इस राहगुज़र पे,
इक लम्बा वक्त बिताया हमने।
पाओं के सिसकते छालों को,
अश्कों से सहलाया हमने।
तेरी मेरी आंखो में,
साये थे चन्द सवालों के।
उम्मीद के चन्द खिलौनों से,
इक दूजे को बहलाया हमने ।
कुछ ख्वाब पकड़ के मुट्ठी में,
अंबर की ओर उछाले हमने ।
कुछ दूर खला में जा पहुंचे,
कुछ को कामिल पाया हमने ।
वो दौर के जब तन्हा थे हम,
रिश्तों के इस जंगल में।
आग़ोश में इक दूजे के खुद को,
महफूज़ सलामत पाया हमने ।
बस यूं ही देना साथ मेरा,
मेरे आखिरी लम्हे तक हमदम।
जायें तो ये शुक्र करें,
कि तुम्हे खुदा से पाया हमने ।
J S Kaafir
4/8/2015
Friday, July 8, 2011
दिल-ए-इज़्तिराब
क्या तुझसे कहू॑ मैं काफ़िर, क्यों चश्म-ए-आब है.
बे-तरह वलवलो॑ का दिल में सैलाब है.
कैसे करू॑ बयान मैं अपनी जुबान से,
कोई बात ता-ब-लब और दश्त-ए-शराब है.
दहशत है मेरी आ॑ख में पर्वाने की मौत से.
बे-रब्त है॑ ख्याल, दिल-ए-इज़्तिराब है.
ज़ाहिरा थे इस जहान मे तेग-ए-बकफ़ सभी.
तबाही का मेरी बायस, इक बुत-ए-शबाब है.
उलझा था एक बार फ़िर आया ना लौट के.
अल्लाह कैसा ज़ुल्फ़ का ये पेच-ओ-ताब है.
शोहरत है मेरे नाम की सारे जहान में.
कहते हैं मुझको देख कर वही खाना-खराब है.
करिये भी क्या गुरूर इस जिस्म-ए-हकीर का.
मेरी हस्ती की भी हकीकत बस मिस्ल-ए-हुबाब है.
जगजीत सिंह काफिर
चश्म-ए-आब = गीली आ॑ख
ता-ब-लब = होठो॑ पर
रब्त = बे-तरतीब
इज़्तिराब = व्याकुल
ज़ाहिरा = प्रकट मे
तेग-ए-बकफ़ = तलवार हाथ मे लिये
मर्कज़ = केन्द्र
बुत-ए-शबाब = खूबसूरत हसीना
पेच-ओ-ताब = उल्झन
हकीर = तुच्छ
मिस्ल-ए-हुबाब = बुलबुले की तरह
Friday, April 8, 2011
दिलासा
जो अश्क छिपे है आँखों मे, इक रोज़ इन्हे बह जाने दे,
ना मुझ से छिपा दिल के छाले, जज़्बो॑ को इन्हे सहलाने दे।
जो राज़ छिपे हैँ तेरे दिल में, तेरे गुजश्ता लम्हों के.
होने दे नुमायाँ वो किस्से, जज़्बात की रौ मे बह जाने दे.
रिश्तो॑ की खलिश है जो तुझको, बे-सूद नही पर मिट जायेगी.
बाहों मे सिमट के मेरी तू , खुद को कभी बहलाने दे.
कश्ती-ए-तमन्ना को माना, साहिल न सही मंझधार सही.
थाम के रख ये हाथ सनम, तूफ़ा॑ को ताकत अजमाने दे.
यूं तो दश्त-ए-रस्म-ओ-जहाँ, कोई राह नही दिवानो को.
मंजिल पे पहुंच ही जाये॑गे, खुद क़दमों को राह बनाने दे.
एहतियाज़ है इस काफ़िर के जुनूँ को, तेरी वफ़ा की शिद्दत की.
इब्तिदा-ए-उल्फ़त को हमदम, अन्जाम पे तू पहुँचाने दे.
खलिश= चुभन
नुमायाँ= ज़ाहिर
बे-सूद= बे-वजह
दश्त-ए-रस्म-ओ-जहाँ= दुनिया की रस्मो क ज॑गल
एहतियाज= जरूरत
इब्तिदा= आर॑भ, शुरुआत
गुज़ारिश
इस तरह हाथ छुडा के तू, कैसे अलग हो सकता है.
साथिया मत छोड के जा, जब लौट के तुझको आना है.
उम्र कि इन लम्बी राहो॑ पर, कैसे चल पाये॑गे तन्हा.
आखिर तो हम दोनो को, इक दूजे का साथ निभाना है.
कैसे गुजर हो सकती है, अम्बर की बाहो॑ मे रहकर.
जो सपने है इन आ॑खो मे, धरती पर उनको लाना है.
मकानो के इस ज॑गल से, पत्थर के लोगो से दूर.
हमको भी इक छोटा सा, खुद का घर बसाना है.
मै रूप हू॑ जैसे बादल का, मिट्टी है तू ममता की.
अपने आ॑गन की बगिया मे, उलफ़त के फ़ूल खिलाना है.
ये क्या के इक दूजे से हम, नाराज़ अभी से हो बैठे.
अभी तो ऐ हमदम हमको, दूर सफ़र पे जाना है.
आ जओ इन बाहो॑ मे, के इन्तजार तुम्हारा अब भी है.
आखिर अपने दीवाने पर, और कितना सितम कमाना है.
अनुभूति
चेतना को मिल रहा है, आज कुछ विस्तार सा.
लड़खड़ाते लक्ष्य को, जैसे मिल रहा आधार सा.
कल्पना पाने लगी है, थाह इस आकाश की.
लग रहा जैसे परो॑ से, छुट गया कुछ भार सा.
आज है मुझ मे समाहित, हर अ॑श इस अस्तित्व का.
प्रकृति के भी ह्रदय से, उमड रहा है प्यार सा.
निस्स्पन्द जल की भांति कुछ, अन्तरम ये शा॑त है.
एक पन्चभूत दृष्टि के अन्दर, हो रहा साकार सा.
कैसे करू मै व्यक्त इस, अव्यक्त से अहसास को.
इस मौन मे तुम्हारी छवी से, कैसा है साक्षात्कार सा.
Saturday, April 2, 2011
उम्मीद
ये रात ये चा॑दनी ये शादाब हवांएं,
ठहर सी गई हैं फ़िज़ाये॑ भी जैसे.
तस्सवुर है तेरा ,मगर तू नही है,
तुझे पास अपने बुलाऎ॑ भी कैसे.
तू बायस है मेरी हर नफ़्स हर कदम का,
ये हकीकत तुझे हम बताये॑ भी कैसे.
महज़ इश्क ही नही॑, ये इबादत भी है,
ये तुझको यकी॑ हम दिलाऎ॑ भी कैसे.
इक ज़र्रे कि आरज़ू है आफ़्ताब का हासिल,
माफ़ हो॑ अब मेरी ये खताये॑ भी कैसे.
ये मुहब्बत नहीं, हर किसी का मुकद्दर,
दिल-ए-नादां को आखिर समझाऎ॑ भी कैसे.
स॑ग-दिल है के अन्जान या किसी और की तू,
ऐ गुलरू तुझे हम आजमाऎ॑ भी कैसे.
सितम तेरे सहने कि आदत सी पड गई,
गम-ए-इश्क मे अश्क बहाऎ॑ भी कैसे.
मेरे आगोश मे हो तेरी रूह साथ तेरे,
इस खाब को हकीकत बनाऎ॑ भी कैसे.
जब तक ज़िन्दा है इक उम्मीद दिल मे,
ऐ काफ़िर इस जहा॓ से जाऎ॑ भी कैसे.
दर्द के अलफ़ाज़
क्या सोचता है क्या लिखता है तू काफ़िर,
क्यो अपने दर्द को अल्फ़ाज़ देता है.
हैरानगी है तेरे ज़हन की गुरबत पे,
इक दिल्लगी को मुहब्बत का नाम देता है.
सरशार है इक हसीन आग तेरा जिस्म तेरी रूह जलाने को,
तेरी दीवानगी है जो उसकी ओर परवाज़ करता है.
उसी आग मे जलकर उसी मे ज्बज़ हो जाए,
वो शम्मा क्या जाने तू यही जज़्बात रखता है.
ये ज़िन्दगी उसकी, खेले चाहे ख्तम करे,
इक उसके सिवा इसपे कौन इख्तियार रखता है.
दर्द के सिवा इश्क का कुछ और नही हासिल,
और पागल है तू इसी दर्द पे नाज़ करता है.
जब मौत मुकर्रर है तेरी इस इश्क के बायस,
फ़िर लम्हा-लम्हा मौत का क्यो रियाज़ करता है.
Thursday, March 24, 2011
मुझको भुला दो !
ना तडपो मेरे गम मे, शाम-ओ-सहर तुम.
मेरे नक्श अपने दिल से मिटा दो !
ना आ॑सू बहाओ मेरी याद मे अब,
बेहतर यही है के मुझको भुला दो !
एक मुफ़लिस को मोहब्बत जताने से पहले,
अन्जाम-ए-मोहब्बत को सोचा तो होता.
अब जो शिकश्ता हो अपने अहद से,
हर अहद से रिहाई मुझे भी दिला दो.
बेहतर यही है के मुझको भुला दो !
महज़ खाब हू मै ओर कुछ भी नही मै,
हकीकत मुझे तुम बना ना सकोगे.
उम्र कैसे कटेगी किसि खाब के स॑ग,
इस खाब को अब नज़र से गिरा दो.
बेहतर यही है के मुझको भुला दो !
देखो जरा अपनी नज़रे उठा कर,
ये बहारे ये कलिया॑ तुम्हारे लिये है.
ना ठुकराओ इनको मेरी वजह से,
न तर्क-ए-मोहब्बत की खुद को सजा दो.
बेहतर यही है के मुझको भुला दो !
मुफ़लिस=गरीब
शिकश्ता=हारा हुआ
अहद=वचन वादा
तर्क कर्ना=छोडना